Certified Human: Only If You’re Somebody’s Man

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 28, 2025 Humour 0

In today’s world, simply being human isn’t enough—you must be somebody’s man. From jobs and promotions to ration and awards, everything belongs to those stamped as “our man.” Without a “man” tag, you’re just a number in the aam aadmi crowd. Whether rubbing noses, bowing flat, or squeezing into ribbon-cutting photos, the rules are clear: survival requires patronage. After all, licenses, favors, even tea—flow only to somebody’s man!

कवि सम्मेलन की रिपोर्ट

Ram Kumar Joshi Sep 28, 2025 हिंदी कविता 0

कवि सम्मेलन की भव्य सजावट, मंच पर कवि और हजारों दर्शक—लेकिन कविता की जगह मसखरी और चुटकुले। थैलियों में नोट और कवियों का ठाठ, राष्ट्रकवियों की आड़ में हास्यास्पद हरकतें। यह व्यंग्य बताता है कि आज कवि सम्मेलनों का मकसद मनोरंजन और कमाई रह गया है, साहित्यिक संदेश नहीं।

बुरा जो देखन मैं चला-व्यंग्य रचना

Vivek Ranjan Shreevastav Sep 24, 2025 व्यंग रचनाएं 0

आज का समाज मुखौटों के महाकुंभ में उलझा है—जहाँ असली चेहरा धूल खाते आईने में छिपा रह गया और नकली मुस्कान वाले मुखौटे बिकाऊ वस्तु बन गए। 'सच्चिदानंद जी की आईने की दुकान' सूनी है क्योंकि लोग सच्चाई से डरते हैं। भीड़ 'सेल्फी-रेडी स्माइल' और 'सोशल मीडिया संजीदगी' खरीदकर खुश है। असल चेहरा देखने की हिम्मत अब दुर्लभ साहस है।

The Madness of Being First – “Sabse Aage Honge Hindustani”

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 23, 2025 Humour 0

“Being first is our birthright—whether it’s buying the first iPhone, overtaking an ambulance, shoving in temple queues, or even rushing ahead in a funeral procession. Indians don’t just live life; they race through it with sabse pehle syndrome. Mount Everest can wait—our summit is the top of every line.”

कोल्हू का लोकतंत्र-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 19, 2025 व्यंग रचनाएं 2

यह लोकतंत्र दरअसल एक कोल्हू है जिसमें बैल बनकर हम आमजन जोते जा रहे हैं। मालिक—नेता और अफसर—आराम से ऊँची कुर्सियों पर बैठकर तेल चूस रहे हैं। जनता की आँखों पर रंग, धर्म और जाति की पट्टियाँ बाँध दी गई हैं ताकि वह देख ही न सके कि असल में किसके लिए घूम रही है। तेल की मलाई मालिकों के हिस्से में जाती है, जनता को मिलती है सिर्फ़ सूखी खली और भ्रमित श्रेय।

लेखक, शॉल और सोहन पापड़ी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

लेखक और शॉल का रिश्ता उतना ही अटूट है जितना संसद और हंगामे का। शॉल ओढ़े बिना लेखक अधूरा, और सोहन पापड़ी के डिब्बे के बिना समारोह अधूरा। यह सम्मान की रीसायकल संस्कृति है—जहाँ शॉल अलमारी से निकलकर अगले कार्यक्रम में, और सोहन पापड़ी बारात तक पहुँच जाती है। लेखक झुकता है—पहले शॉल के बोझ से, फिर आयोजकों की विचारधारा की ओर।

पान-दर्शन शास्त्र-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 11, 2025 व्यंग रचनाएं 0

पान हमारी सभ्यता का ऐसा रस है जिसने गली-कूचों को संसद बना दिया। दीवारों पर मुफ्त “पीक आर्ट,” नेताओं के वादों में कत्था-चूना और जनता के मुँह में चुनावी पान—यह वही संस्कृति है जहाँ पानवाला ही न्यूज़ चैनल, गूगल मैप और थिंक-टैंक रहा। आज इंस्टा स्टोरी ने उसकी जगह ले ली है, मगर स्वाद, लाली और व्यंग्य अब भी उसी गिलौरी में छुपा है।

ब्लडी रेटिंग्स ‘Zwigato’ में गिग वर्ल्ड की सच्चाई

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 8, 2025 Cinema Review 0

‘Zwigato’ एक गिग-इकॉनॉमी राइडर की रोज़मर्रा की जद्दोजहद का सधी हुई, मानवीय चित्रपट है—जहाँ ऐप का एल्गोरिदम नई फैक्ट्री है, रेटिंग नया ठप्पा, और बारिश में भी चलती है रोज़ी-रोटी की बाइक। कपिल-शाहाना की बिना शोर वाली अदाकारी बेरोज़गारी, शोषण और शहरी पलायन की सच्चाइयों को नरमी से काटती है।

From Abhāv (Scarcity) to Prabhāv (Influence) – And Yet, the Heart Remains Sad

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 2, 2025 English-Write Ups 0

Forty years ago, happiness was cheap. A stick could be toy, antenna, and mango-harvesting tool. A single roll of cloth dressed the whole family—eventually turning into bags and mops. Doordarshan’s Ramayan was a divine weekly event, while sugar toys were both playthings and sweets. Today, despite endless gadgets and choices, smiles feel mortgaged. The old equation still rings true: fewer resources, more joy; more resources, less joy.