फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

रोशनी ख़ुशबू की -गजल

Kishan Tiwari Sep 5, 2025 गजल 0

किशन तिवारी 'भोपाल' की यह ग़ज़ल जीवन की पीड़ा, संघर्ष और रिश्तों की विडंबना का गहन बयान है। इसमें मोहब्बत और विश्वास के टूटे बंधन, सच पर अडिग रहना, महफ़िल में अकेलापन और सत्ता की चुप्पी जैसे बिंब पाठक को आत्ममंथन की ओर ले जाते हैं।

“रिश्ते (गजल ) दो छायाओं के बीच अनकहे जुड़ाव ।”

Babita Kumawat Jun 23, 2025 Poems 4

गजल – रिश्ते रिश्तों में विसाल उतना है जरूरी, मेरे लिए हर सिम्त में रिश्ते है जरूरी पर कुछ लोग बना देते है मैदान-ए-मतकल, मेरी ख्वाहिश है बनाना रिश्तों में खुशी हर पल कैद-ए-बाम मिलते कुछ लोग ऐसे है, जो पेच-ओ-खम रिश्तों में डाल देते हैं मैं हर शाख, हर खार, हर कली से मिली, […]