द्विचक्र-वाहिनी की आत्मकथा : स्मृतियों पर घूमते पहिए
“मैं तेज़ नहीं हूँ, न आधुनिक—पर मैंने चलना सिखाया है। मेरे चक्रों पर समय नहीं, स्मृतियाँ घूमती हैं।”
“मैं तेज़ नहीं हूँ, न आधुनिक—पर मैंने चलना सिखाया है। मेरे चक्रों पर समय नहीं, स्मृतियाँ घूमती हैं।”
मेरा बाप घर में मर गया, पर बाबूजी की फ़ाइल में अभी ज़िंदा है। बिन पैसे के यहाँ कोई मरता नहीं— यहाँ मौत भी सरकारी प्रक्रिया है।
गोपाष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ों का उत्सव है — वह दिन जब हम यह स्मरण करते हैं कि हमारी संस्कृति, हमारी खेती, और हमारा जीवन — सब गो के उपकार पर टिका है। गोबर से लीपे आँगन, दूध से पोषित पीढ़ियाँ और बैल से चलती हल की रेखाएँ — यही तो भारत का असली तंत्र है।