हे ग्रीष्म देवी ,हे प्रचंड तापसी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 22, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब ग्रीष्म ऋतु देवी का रूप धरकर पृथ्वी पर उतरती है, तो सड़कें सूनी हो जाती हैं, बिजली आंख-मिचौली खेलने लगती है, जलजीरा और आइसक्रीम जीवनदायिनी प्रतीत होते हैं, और मनुष्य वातानुकूलित गुफाओं में शरण लेने लगता है। यह व्यंग्य रचना भारतीय गर्मी की त्रासदी को हास्य, तंज और सांस्कृतिक बिंबों के साथ बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है।

लिखा के लाए हैं…

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।” “किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।” “इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।” “कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”

लोकतंत्र की गाड़ी चल पड़ी, पम पम पम!

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 7, 2025 Blogs 0

लोकतंत्र की गाड़ी पम-पम-पम करती आगे बढ़ रही है—टायरों में हवा नहीं, पर वादों की फुलावट है। ड्राइवर बूढ़ा है पर जीपीएस नया, जो सिर्फ उसी की सुनता है। जनता सीट बेल्ट बाँधकर सफ़र का आनंद ले रही है—मंज़िल का सपना है ‘2047 का भारत’। इंजन पुराने भाषणों से गरम है, और भोंपू झूठे वादों का गान गा रहा है।