मोबाइल फोन की आंच में-हास्यम्- व्यंग्यम्
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
बचपन में लाइट जाना उत्सव था—कहानियाँ, तारे और परिवार। आज लाइट जाए या ग्रिड फेल हो—ज़िंदगी स्क्रीन के सहारे चलती है। यह कार्टून उसी बदलाव पर एक हल्का, चुभता और मुस्कराता व्यंग्य है।
तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है, इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है। AI जवाब दे रहा है— पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।