Anushka Garg
Aug 28, 2026
News and Events
0
नेपाल की हालिया विनाशकारी बाढ़ केवल पानी की आपदा नहीं, बल्कि हिमनद टूटने, भूस्खलन, debris flow, बदलते जलवायु पैटर्न और संवेदनशील हिमालयी भूगोल की संयुक्त चेतावनी है। जानिए इस त्रासदी के पीछे की प्राकृतिक प्रक्रियाएँ, मानवीय हस्तक्षेप और भविष्य के लिए जरूरी सबक।
Prem Chand Dwitiya
May 19, 2026
व्यंग रचनाएं
0
कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?
Dr Shailesh Shukla
May 8, 2026
Agriculture/environment
0
पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन क्यों आवश्यक है? जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, सतत विकास, जल संरक्षण, जंगल, ऊर्जा और भारत के भविष्य पर आधारित विस्तृत हिंदी लेख पढ़ें।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 22, 2026
Culture
0
धरती संकेत दे रही है, पर मनुष्य उन्हें अनसुना कर रहा है। विश्व पृथ्वी दिवस क्या केवल उत्सव बनकर रह गया है या यह आत्मपरीक्षण का अवसर है—यह लेख इसी प्रश्न को गहराई से टटोलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 19, 2026
Science Talk (विज्ञान जगत )
0
यह लेख विकासवाद को केवल जीन या व्यक्ति की सीमा में नहीं बाँधता, बल्कि एपिजेनेटिक्स, सामाजिक प्रजातियों और मानव सांस्कृतिक विकास के माध्यम से यह दिखाता है कि परिवर्तन हमेशा सामूहिक परिस्थितियों में आकार लेता है। जीन बीज हैं, पर उनका भविष्य समाज, पर्यावरण और समय तय करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 11, 2025
Darshan Shastra Philosophy
0
“मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा कोई भौगोलिक नहीं होती — वह भीतर जाती है।
आत्मबोध से विश्वबोध तक की यह यात्रा ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की प्रक्रिया है — जहाँ व्यक्ति स्वयं को जानकर समस्त सृष्टि से एकात्म हो जाता है।
जब ‘स्व’ का दीप जलता है, तब ‘सर्व’ का सूरज उगता है — यही चेतना की परिपूर्णता है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 31, 2025
Culture
0
गोपाष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ों का उत्सव है — वह दिन जब हम यह स्मरण करते हैं कि हमारी संस्कृति, हमारी खेती, और हमारा जीवन — सब गो के उपकार पर टिका है। गोबर से लीपे आँगन, दूध से पोषित पीढ़ियाँ और बैल से चलती हल की रेखाएँ — यही तो भारत का असली तंत्र है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Oct 26, 2025
Culture
0
छठ पर्व अब बिहार की सीमाओं से निकलकर विश्वभर में भारतीय आस्था का प्रतीक बन चुका है। यह केवल सूर्य उपासना नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के संवाद का जीवंत पर्व है — जहाँ श्रम, श्रद्धा और संतुलन मिलकर जीवन के हर अंधकार को प्रकाश में बदल देते हैं। लोकल से ग्लोबल तक, छठ भारतीय संस्कृति की आत्मा को उजागर करता है।
Pradeep Audichya
Jun 30, 2025
व्यंग रचनाएं
0
बारिश की रात झींगुरों की आवाज़ को कभी ध्यान से सुनिए – वो बस टर्राहट नहीं, एक आंदोलन की गूंज है। वे मंच पर अधिकारों की मांग कर रहे हैं – आरक्षण, रॉयल्टी, बिजली के खंभे, होटल प्रवेश और एक "झींगुर अत्याचार निवारण आयोग" की स्थापना!
Dr. Mulla Adam Ali
Jun 23, 2025
Blogs
0
जंगल केवल पेड़ों और जानवरों का घर नहीं, बल्कि हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। यह हरियाली, शांति, और जैव विविधता का प्रतीक हैं, जो धरती को संतुलन और सांसें प्रदान करते हैं। लेकिन आज मानवीय लालच और विकास की अंधी दौड़ ने इन प्राकृतिक धरोहरों को संकट में डाल दिया है। प्रस्तुत कविता “जंगल […]