कीमतें आसमान नहीं छू रहीं—असल में हमारी मान्यताएँ उछल रही हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 10, 2026 समसामयिकी 0

सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।

युवा शक्ति और भारत की वैश्विक पहचान

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 19, 2026 हिंदी लेख 0

इक्कीसवीं सदी में भारत की वैश्विक पहचान उसकी युवा शक्ति गढ़ रही है—जो तकनीक, संस्कृति और नैतिकता को साथ लेकर चलती है। ब्रेन ड्रेन से ब्रेन सर्कुलेशन तक का यह सफ़र भारत को उपभोक्ता नहीं, समाधानकर्ता राष्ट्र बनाता है।

युवा शक्ति और राष्ट्र-निर्माण: भारत की आत्मा का पुनर्जागरण

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 19, 2026 Self Help and Improvements 0

भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा मन है—साहसी, आकांक्षी और साफ़ दिल वाला। राष्ट्र-निर्माण केवल सड़क-पुल नहीं, मूल्यों और चरित्र का निर्माण है। जब युवा सेवा, उद्यमिता और नीति-भागीदारी से जुड़ते हैं, तो भविष्य आकार लेता है।

लोकसमाज ने मकर संक्रांति को एक दिन का उत्सव नहीं,बल्कि सामूहिक भावबोध का पर्व बनाया

Priyanka Ghumara Jan 12, 2026 Culture 0

“यह पर्व केवल मौसम नहीं बदलता, जीवन की दृष्टि बदलता है।” “लोहड़ी संघर्ष के बाद आने वाली राहत और संभावना का लोकउत्सव है।” “लोकपर्वों की सादगी ही उनकी सबसे बड़ी सुंदरता है।” “परंपरा तब जीवित रहती है, जब वह समय से संवाद करती है।”

वंदे मातरम के 150 वर्ष: एक गीत नहीं, राष्ट्र-धड़कन का उत्सव

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 15, 2025 Culture 0

वंदे मातरम कोई साधारण गीत नहीं है—यह वह ध्वनि है जो कभी कोड़ों की मार के बीच भी गूंजती थी और आज बहसों के शोर में दबाई जा रही है। इसके 150 वर्ष हमें यह याद दिलाते हैं कि राष्ट्र केवल सीमाओं से नहीं, स्मृतियों से बनता है।

स्वाभिमान का स्वर: 150 वर्ष वंदे मातरम्

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 11, 2025 Important days 0

“वंदे मातरम् केवल दो शब्द नहीं, एक दीर्घ श्वास है जो इस उपमहाद्वीप की नसों में आज भी बहती है। डेढ़ सदी बाद भी यह गीत हमें याद दिलाता है कि भारत केवल भौगोलिक रेखाओं का जोड़ नहीं, एक जीवित अनुभूति है। यह गीत राजनीति से ऊपर उठकर नागरिक-धर्म का गान है — एक ऐसा धर्म जो मनुष्यता को श्रेष्ठ मानता है, और मातृभूमि को ‘भूमि’ से ‘मां’ बना देता है।”

जय छठ मैया! राष्ट्रभक्ति और प्रकृति उपासना का दिव्य पर्व

Prahalad Shrimali Nov 1, 2025 Poems 0

छठ पर्व केवल आस्था का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, राष्ट्र और संस्कृति के प्रति समर्पण का सामूहिक संकल्प है। यह लेख छठ मैया की भक्ति के माध्यम से स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, राष्ट्र प्रेम और जनकल्याण की भावना का संदेश देता है — जहां सूर्य उपासना के साथ-साथ देशभक्ति और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम दिखाई देता है।

गोपाष्टमी : गो, गृह और गंगा की तरह पवित्र — हमारी सभ्यता का अदृश्य आधार

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 31, 2025 Culture 0

गोपाष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की जड़ों का उत्सव है — वह दिन जब हम यह स्मरण करते हैं कि हमारी संस्कृति, हमारी खेती, और हमारा जीवन — सब गो के उपकार पर टिका है। गोबर से लीपे आँगन, दूध से पोषित पीढ़ियाँ और बैल से चलती हल की रेखाएँ — यही तो भारत का असली तंत्र है।

नासदीय सूक्त की दार्शनिक व्याख्या

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 28, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर विश्व के सबसे प्राचीन दार्शनिक चिंतन में से एक है। यह कहता है कि जब न अस्तित्व था न अनस्तित्व, तभी कुछ अप्रकट ऊर्जा ने सृष्टि का आरंभ किया। “काम” या इच्छा पहली हलचल थी जिसने ब्रह्मांड को गति दी। यह सूक्त हमें सिखाता है कि प्रश्न ही ज्ञान का प्रथम चरण हैं—और रहस्य ही सृष्टि की सबसे बड़ी सुंदरता।

दीपावली — अंधकार के गर्भ से ज्योति का जन्म

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 20, 2025 Important days 1

“दीपावली अमावस्या की निस्तब्धता से जन्मी वह ज्योति है जो केवल घर नहीं, हृदय की गुफाओं को आलोकित करती है। यह बाह्य उत्सव से अधिक आत्मदीपकत्व का अनुष्ठान है — अंधकार को मिटाने नहीं, उसमें दीप जलाने का साहस।”