मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।

मंचीय कवि सम्मेलन की मच मच

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 26, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज का मंचीय कवि सम्मेलन कविता का नहीं, प्रदर्शन का उत्सव बन गया है—जहाँ कविता घूंघट में सिमटी रहती है और चुटकुले, अभिनय और जुगाड़ का नाच चलता रहता है।