मोबाइल फोन की आंच में-हास्यम्- व्यंग्यम्
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
कभी कच्चा केला, कभी पका आम— बाज़ार, राजनीति और मोबाइल की आंच में हर रिश्ता, हर मूल्य अपना रंग बदलता हुआ मिलता है।
सोशल मीडिया पर बैन की ख़बर ने किशोरों को सिर्फ़ चिंतित नहीं किया, उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ कर दिया। जहाँ किशोर अपनी डिजिटल पहचान के छिनने से डर रहे हैं, वहीं बुज़ुर्ग पीढ़ी उसी स्मार्टफोन में गुम है, जिस पर प्रतिबंध की बात हो रही है। यह कहानी केवल मोबाइल की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के दोहरे चरित्र और डिजिटल नैतिकता की है।