फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

समय का पहिया चलता है-कविता रचना

Vidya Dubey Sep 16, 2025 हिंदी कविता 0

माँ की यादों में भीगती पलकों से उठती सिसकियाँ अब कभी थमती नहीं। अनकही बातों की भीड़ में हर करवट बेचैनी बनकर जागती है। आँचल की नमी, गोदी का सुकून और अधूरी बातें—सब समय के पहिए में छूट गए। अब बस माँ का इंतज़ार ही शेष है।

आखिर कब तक ढूढ़े मां-Poem

Mamta Avadhiya Sep 5, 2025 हिंदी कविता 0

यह रचना माँ के प्रति गहरी भावनाओं और स्मृतियों से भीगे रिश्ते का मार्मिक चित्रण है। इसमें माँ की गोद, आँचल और मुस्कान को याद करते हुए कवि अपने मन की बेचैनी, अधूरी बातों और सपनों की ओर संकेत करता है। प्रतीक्षा और तड़प इसे और भावुक बना देती है।

दोस्त बदल गए हैं यार-कविता रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 4, 2025 Poems 2

समय की धारा में बहते हुए रिश्तों का यह मार्मिक चित्रण है — जहाँ कभी हँसी-ठिठोली, सपनों की साझेदारी और चाय की चौपाल थी, वहाँ अब दिखावटी पोस्ट और व्यस्तताएँ हैं। 'दोस्त बदल गए हैं यार' न केवल एक वाक्य है, बल्कि एक पीढ़ी की सामूहिक टीस है, जो अपनी जड़ों की तलाश में आज भी पलटकर देखती है।