सम्यक ज्ञान, सम्यक दृष्टि : जब जानना कम और देखना अधिक ज़रूरी हो जाता है

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 6, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है। जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है। यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।

मैं और मेरी हिंदी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 13, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मैं, अंग्रेज़ी दवा लिखने वाला डॉक्टर, अब हिंदी में लिखने लगा तो शहर के ‘हिंदी प्रहरी’ गुरुजी मेरी हर पोस्ट में बिंदी-अनुस्वार ढूंढते फिरते हैं। फेसबुक की वॉल अब क्लासरूम बन गई है—खद्दर कुर्ता, झोला, फाउंटेन पेन और ‘हिंदी की टूटी टांग’ का स्थायी दर्द। मैं त्रिशंकु-सा, हिंग्लिश और देसी मुहावरे के बीच लटका, गूगल इनपुट से जूझता, फिर भी लिखने की खुजली शौक से खुजाता हूँ। बेखौफ़, मुस्कुराते हुए.

रियाज़ की निरंतरता और सृजन का आत्म-संघर्ष

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 5, 2025 हिंदी लेख 3

"लेखन जब रियाज़ बन जाए, तो समाज उसे शौक समझने लगता है और गुटबाज़ी उसे अयोग्यता का तमगा पहनाने लगती है। एक डॉक्टर होकर सतत सृजन करना बहुतों को पचता नहीं। आत्म-संतुष्टि और गुट की तालियों के बीच जूझता लेखक जब बिना पढ़े प्रशंसा सुनता है, तो रचना की पीड़ा और भी गहरी हो जाती है। यही आत्म-संघर्ष है — एक लेखक की रचना प्रक्रिया का सच्चा यथार्थ, जहाँ वह लगातार खुद से लड़ता है, फिर भी लिखता है, क्योंकि यह उसका रियाज़ है… उसका आत्मसुख।"