मेरा देश आगे बढ़ रहा है-kavita
“रास्ते मिल गए हैं, पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।” “हम आगे इसलिए नहीं बढ़े कि सबको साथ ले जाएँ, बल्कि इसलिए कि पीछे छूटे लोग दिखाई न दें।” “वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए— लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
“रास्ते मिल गए हैं, पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।” “हम आगे इसलिए नहीं बढ़े कि सबको साथ ले जाएँ, बल्कि इसलिए कि पीछे छूटे लोग दिखाई न दें।” “वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए— लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।