जब बोले अटल बिहारी

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 24, 2025 People 0

यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।

 ‘समय के साये ’ : समय की कविताएं

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 22, 2025 Book Review 0

समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है। यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है। जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है। डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है। यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।