Pawan Ghumara
Dec 29, 2025
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“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।”
“फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।”
“लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 26, 2025
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एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 6, 2025
व्यंग रचनाएं
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बाढ़ सिर्फ पानी नहीं लाती, संवेदनहीनता की परतें भी उघाड़ती है। "बाढ़ पर्यटन" एक ऐसी ही कड़वी सच्चाई को उजागर करती है जहाँ किट्टी पार्टी की महिलाएं बाढ़ को तमाशा मान बैठती हैं। अफसरशाही, मीडिया, सोशल मीडिया फॉलोअर्स और सजी-धजी संवेदनहीनता — सब मिलकर बना रहे हैं एक अमानवीय हास्यप्रद दृश्य। हँसी की आड़ में छुपी करुणा की चीख यहाँ साफ सुनाई देती है।