“AI हर जगह है” — एक व्यंग्य

Wasim Alam Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है, इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है। AI जवाब दे रहा है— पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।

मेरी बात हो गई है ऊपर-व्यंग्य रचना

Pradeep Audichya Jul 31, 2025 व्यंग रचनाएं 2

नेता जी ने बचपन में ही तय कर लिया था कि वह सिर्फ नेता बनेंगे। अब जनसेवा के नाम पर वह चाय की दुकानों पर घूमते हैं, उधारी बढ़ाते हैं और हर बात में कहते हैं – "मेरी बात ऊपर हो गई है।" कार्यकर्ता जेल में हो या शहर अधर में – समाधान ऊपर तय होता है।

सिस्टम, सिस्टमैटिकली बच निकला है —व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 26, 2025 Blogs 7

एक और सरकारी छत गिरी, मासूम मरे, सिस्टम फिर बच निकला — जैसे संविधान में इसके लिए छूट हो। सरकार की संवेदना ट्विटर और प्रेस के लिए आरक्षित रही, नतीजे में निलंबन, मुआवजा और मगरमच्छी आँसू मिले। असल सवाल वही रहा — कब तक ढहती छतों के नीचे संवेदनशीलता दफन होती रहेगी और सिस्टम बाल बांका किए बिना बच निकलता रहेगा?

अमरूद की अमर कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 6, 2025 व्यंग रचनाएं 1

इस व्यंग्य चित्रण में एक हाई-फाई कॉलोनी की किट्टी पार्टी में एक अधिकारी की पत्नी, बाढ़ प्रभावित गांवों की त्रासदी को पर्यटन अनुभव की तरह प्रस्तुत करती है। महिलाएं फोटो देखकर वाह-वाह करती हैं — किसी के डूबते मवेशी, किसी माँ का छत पर रोता चेहरा भी ‘सीन’ बन जाता है। यह रचना सामाजिक संवेदनहीनता और आधुनिक तमाशाई मानसिकता पर करारा कटाक्ष है।