मेरी OPD का शीशा: मरीजों की आदतों और व्यवहार पर हास्य-व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 31, 2026 व्यंग रचनाएं 0

#   मेरी OPD का शीशा  मेरी OPD के दरवाज़े में एक शीशा लगा दिया गया था। जब लगाया गया था, तब कोई बहुत गहरी सोच-विचार नहीं हुई थी। बस किसी दूसरे अस्पताल में ऐसा शीशा लगा देखा और हमने भी उसकी नकल कर ली। शीशा लगाने वाले ने बड़े गर्व से उसकी खासियत बताई, […]

रैपिडो युग: अब आदमी से पहले उसकी लोकेशन पहुँच जाती है

Anushka Garg Aug 21, 2026 News and Events 0

रैपिडो बुक करते ही आदमी बाद में मिलता है, लेकिन उसका नाम, बाइक नंबर, रेटिंग और लोकेशन पहले पहुँच जाती है। डिजिटल मैप, लाइव लोकेशन और बाइक टैक्सी के इस दौर पर पढ़िए एक चुटीला हास्य-व्यंग्य।

पार्टी अध्यक्ष का विलाप-कुर्सी, विश्वासघात और लोकतंत्र का तमाशा

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 28, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“मंच सूना है, माइक उदास है, और अध्यक्ष महोदय की कुर्सी… बस वही एक चीज़ है जिसे वे पूरे विश्वास से पकड़कर बैठे हैं—जैसे लोकतंत्र की आखिरी उम्मीद उसी के चार पैरों पर टिकी हो।”

मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।

हनुमान जी का नामांकन और जाति का कॉलम

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 14, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब हनुमान जी चुनाव लड़ने पहुँचे, तो उन्हें सबसे बड़ा संकट रावण नहीं, बल्कि ‘जाति’ कॉलम में मिला। यह व्यंग्य भारतीय लोकतंत्र के उस कटु सत्य को उजागर करता है, जहाँ इंसानियत से पहले जाति पूछी जाती है।

इतिहास का संदूक और बब्बन चाचा की मूँछें

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 4, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बब्बन चाचा ने परदादा की संदूक में रखी मूँछें निकालकर इतिहास को चेहरे पर चिपका लिया। अब वे हर सुबह ‘इतिहास अलाप’ करते हैं और वर्तमान को ताले में बंद कर देते हैं—क्योंकि आजकल असली मेहनत से ज्यादा आसान है विरासत पहन लेना।

भगवान बचाए ऐसे रिश्तेदारों से!

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 28, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बीमारी से ज्यादा थका देने वाला होता है रिश्तेदारों का हाल-चाल महाकुंभ—जहाँ हर कोई डॉक्टर भी है, जज भी और जांच अधिकारी भी।

मिलती पेंशन तो काहे का टेंशन,नो मेंशन?

Dinesh Gangarde Mar 7, 2026 व्यंग रचनाएं 2

जब नौकरी विदा लेती है तो जीवन में एक नई नायिका प्रवेश करती है—पेंशन। यह ऐसी प्रेमिका है जो हर महीने समय पर आती है, मूड नहीं बदलती और बुढ़ापे में आत्मसम्मान और सुकून का सहारा बन जाती है। हास्य-व्यंग्य के अंदाज़ में पेंशन की इसी “वफादार महबूबा” पर यह रोचक लेख।

महिलाओं की टीवी बहस!

Ram Kumar Joshi Feb 26, 2026 हास्य रचनाएं 1

एक ज्वलंत विषय पर बहस करवाने की योजना स्टूडियो प्रबंधन के लिए अप्रत्याशित परीक्षा बन गई। वर्णमाला क्रम, विशेषज्ञता और समय-सारिणी सब धरी रह गईं—और बहस का मंच देखते ही देखते शक्ति प्रदर्शन में बदल गया।

जूता बचाओ, शादी बचाओ अभियान

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 24, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तलाक का असली कारण अब ईगो या संवादहीनता नहीं, दूल्हे का जूता घोषित हो चुका है। शादी में जूता चुराई नहीं, मानो वैवाहिक सत्ता परिवर्तन का शंखनाद हो गया हो।