रेवड़ी की सिसकियां-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 2, 2025 व्यंग रचनाएं 0

"रेवड़ी की सिसकियां" एक व्यंग्यात्मक संवाद है उस 'जनकल्याणकारी नीति' की आत्मा से, जिसे अब राजनैतिक मुफ्तखोरी की देवी बना दिया गया है। लेख में रेवड़ी देवी स्वयं अपने नाम पर हो रहे राजनैतिक तमाशे से व्यथित हैं — उन्हें ग़रीबों की सहायक बनने के बजाय वोट हथियाने का औज़ार बना दिया गया है। मुफ्त योजनाओं की बाढ़ में मेहनत, करदाता और योग्यता हाशिए पर चले गए हैं। लेख एक गहन कटाक्ष है उस लोकतांत्रिक दिशा पर, जहां वादों की फेहरिस्त में 'काम' नहीं, 'फ्री' है।

संस्था का स्वयंवर: ‘योग्यता’ नहीं, ‘जुगाड़’ की वरमाला!

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 30, 2025 व्यंग रचनाएं 6

संस्था अब कोई विचारशील मंच नहीं, एक शर्मीली दुल्हन बन चुकी है, जिसका स्वयंवर हर दो साल बाद होता है। यहां वरमाला योग्यताओं पर नहीं, जुगाड़ और सिफारिशों पर डाली जाती है। मंच सजे हैं, दूल्हे कतार में हैं—किसी के पास डिग्री, तो किसी के पास 'ऊपर' तक पहुंच। पढ़िए, जब संस्था के मंडप में लोकतंत्र लपका बनने निकल पड़ा!

गिरने में क्या हर्ज़ है-पुस्तक समीक्षा व्यंग्यकार अर्चना चतुर्वेदी द्वारा

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 9, 2025 Book Review 1

‘गिरने में क्या हर्ज है’ डाक्टर मुकेश ‘असीमित’ जी का पहला व्यंग्य संग्रह है । पहले संग्रह के हिसाब से देखा जाए तो डॉक्टर साब व्यंग्य में नए हैं पर इनकी रचनाएं काफी परिपक्व हैं । भाषा की बात हो या शिल्प की या विषय की डॉक्टर साब मंझे हुए व्यंग्यकार ही महसूस होंगें । […]

व्यंग्य की दुनिया में एक जागरूक आमद -पुस्तक समीक्षा -डॉ अतुल चतुर्वेदी

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 5, 2025 Book Review 1

‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ एक बहुआयामी व्यंग्य संग्रह है जिसमें डॉ. मुकेश असीमित ने समाज, राजनीति, शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों की विसंगतियों को पैनी दृष्टि और चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत किया है। आत्मव्यंग्य, रूपकों और भाषिक कलाकारी से भरपूर यह संग्रह न केवल गुदगुदाता है, बल्कि गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। यह संग्रह व्यंग्य विधा में एक साहसी शुरुआत है।

पुरुष्कार का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित' May 13, 2025 Blogs 0

पुरस्कारों की चमक साहित्यकारों को अक्सर पितृसत्ता की टोपी पहना देती है। ये ‘गुप्त रोग’ बनकर छिपाया भी जाता है और पाया भी जाता है, झाड़-पोंछकर अलमारी में रखा जाता है। साहित्यिक संसार में आज पुरस्कार एक ‘औषधि’ है – बिना मांगे मिल जाए तो शक होता है, न मिले तो रोग गहराता है।

मदर्स डे –एक दिन की चांदनी फिर अँधेरी…

डॉ मुकेश 'असीमित' May 11, 2025 Blogs 0

एक तीखा हास्य-व्यंग्य जो दिखावे के मदर्स डे और असल माँ के संघर्षों के बीच की खाई को उजागर करता है। सोशल मीडिया की चमक के पीछे वो माँ छुपी है, जो आज भी बिना शिकायत अपने बच्चों की खुशियाँ बुन रही है — रोटी सेंकते हुए, ममता लुटाते हुए। पढ़िए, मुस्कुराइए और सोचिए — क्या एक पोस्ट ही काफी है उस ममता के लिए?

मकान मालिक की व्यथा –व्यंग रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 12, 2024 व्यंग रचनाएं 7

किराए के लिए उन्हें फोन करता हूँ तो पता लगता है, वो बहुत दुखी हो गए हैं, उनकी सात पुश्तों में भी कभी किसी ने ऐसे टटभुजिये मकान में शरण नहीं ली , मकान उनकी नजर में पनौती है ,कह रहे थे इस माकन में घुसते ही उनकी बेटी बीमार हो गयी ,डेड लाख रु […]