मूषक राज, औकात के लिए किसी सेलिब्रिटी को मैनेज करो! | चूहा, कॉकरोच और राजनीति पर व्यंग्य

Prem Chand Dwitiya Sep 20, 2026 व्यंग रचनाएं 0

फर्स्ट एसी में चूहों और कॉकरोचों की खबर से शुरू होकर यह व्यंग्य लोकप्रियता, सेलिब्रिटी संस्कृति और राजनीति की विचित्र दुनिया तक पहुँचता है। मूषक महाराज के पास आतंक भी है, इतिहास भी और गणेश जी की सवारी होने का गौरव भी—फिर भी कॉकरोच उनसे आगे कैसे निकल गया? डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का चुटीला व्यंग्य इसी विडंबना पर तीखा कटाक्ष करता है।

समझदार होने का खामियाज़ा | हास्य-व्यंग्य | डॉ. मुकेश असीमित

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 16, 2026 व्यंग रचनाएं 0

समझदार कहलाना हमेशा सम्मान नहीं होता। कई बार समाज उसी आदमी से सबसे ज्यादा एडजस्टमेंट, माफी, त्याग और समझौते की उम्मीद करने लगता है। इसी विडंबना पर आधारित एक चुटीला हास्य-व्यंग्य।

ठोस, द्रव और गैस—तीनों में महंगाई! | आम आदमी पर महंगाई का व्यंग्य

Prem Chand Dwitiya Sep 13, 2026 व्यंग रचनाएं 0

महंगाई अब केवल बाजार के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं रही। शक्कर और प्याज जैसी ठोस वस्तुओं से लेकर तेल-पेट्रोल जैसे द्रव पदार्थों और घरेलू गैस तक—उसने पदार्थ की तीनों अवस्थाओं में आम आदमी को जकड़ लिया है। पढ़िए डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का हास्य-व्यंग्य।

रियल दोस्ती की बाट लगाती वर्चुअल दोस्ती और बढ़ता अकेलापन !

Prem Chand Dwitiya Sep 11, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मोबाइल में सैकड़ों कॉन्टैक्ट, दर्जनों व्हाट्सऐप ग्रुप और सोशल मीडिया पर अनगिनत दोस्त—फिर भी जीवन में अकेलापन क्यों बढ़ रहा है? डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का यह हास्य-व्यंग्य वर्चुअल दोस्ती, वास्तविक रिश्तों, रिटायरमेंट और बदलते सामाजिक जीवन पर तीखी लेकिन मनोरंजक टिप्पणी करता है।

मेरी OPD का शीशा: मरीजों की आदतों और व्यवहार पर हास्य-व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 31, 2026 व्यंग रचनाएं 0

#   मेरी OPD का शीशा  मेरी OPD के दरवाज़े में एक शीशा लगा दिया गया था। जब लगाया गया था, तब कोई बहुत गहरी सोच-विचार नहीं हुई थी। बस किसी दूसरे अस्पताल में ऐसा शीशा लगा देखा और हमने भी उसकी नकल कर ली। शीशा लगाने वाले ने बड़े गर्व से उसकी खासियत बताई, […]

शर्त की सौगंध: ऊपरी कमाई और भ्रष्ट बाबुओं पर तीखा व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Aug 25, 2026 व्यंग रचनाएं 0

कलेक्ट्रेट के दो बाबू ऊपरी कमाई से एक तोला सोना खरीदने की शर्त लगाते हैं। मगर जब बेईमानी की प्रतियोगिता में भी बेईमानी होने लगती है, तो रिश्वतखोरी का पूरा खेल सार्वजनिक हो जाता है। डा. राम कुमार जोशी की यह व्यंग्य रचना सरकारी दफ्तरों, भ्रष्टाचार, अनुकंपा नियुक्ति और व्यवस्था की विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करती है।

पुरस्कार को नमस्कार है: साहित्यिक पुरस्कारों की राजनीति और सम्मान संस्कृति पर करारा व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 20, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज साहित्य में लेखक बढ़ रहे हैं, पाठक घट रहे हैं और पुरस्कारों की संख्या दोनों से तेज़ी से बढ़ रही है। उम्र, वजन, लेखन गति से लेकर डिजिटल रिचार्ज तक—यदि सम्मान बाँटने की यही रफ्तार रही तो हर लेखक के लिए कोई-न-कोई पुरस्कार तय मिलेगा। साहित्यिक पुरस्कार संस्कृति पर एक चुटीला और धारदार व्यंग्य।

लौटी हुई रचना: संपादक के ‘खेद सहित’ से घायल लेखक की व्यथा

Pradeep Audichya Aug 4, 2026 व्यंग रचनाएं 1

लेखक किसी रचना को विचारों की प्रसव-पीड़ा सहकर जन्म देता है, शब्दों और मात्राओं से पालता-पोसता है और फिर पत्र-पत्रिका को भेज देता है। लेकिन जब वही रचना संपादक के “खेद सहित” लौट आती है, तो लेखक के मन की दशा वैसी हो जाती है जैसे मोबाइल घंटों चार्ज पर लगा हो और बाद में पता चले कि स्विच ही बंद था। साहित्यिक दुनिया की इसी विडंबना पर एक आत्मीय और चुटीला व्यंग्य।

जंतर मंतर और छूमंतर!-haasy vyangya

Prem Chand Dwitiya Aug 2, 2026 व्यंग रचनाएं 1

जंतर-मंतर केवल आंदोलनों का ठिकाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ऐसा जादुई मंच है जहाँ नारों की आवाज संसद तक पहुँचती है। यहाँ कुछ आंदोलन तंत्र को बदल देते हैं, तो कुछ स्वयं छूमंतर हो जाते हैं। कॉकरोच-पार्टी से लेकर तंतर, मंतर और टाइम-आउट तक—डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक राजनीतिक व्यंग्य।

मर्दानी -बड़े साहब के बाद बीबी जी और भी बड़ी निकलीं!

Ram Kumar Joshi Jul 28, 2026 व्यंग रचनाएं 1

रिश्वत कांड में बड़े साहब की मृत्यु के बाद मुआवजे, सरकारी बंगले और अनुकम्पा नियुक्ति के लिए हुए समझौते पर आधारित तीखा हिंदी व्यंग्य।