तपती धरती, तड़पता जीवन और तंत्र की तंद्रा : बिगड़ता पर्यावरण संतुलन औरअस्तित्व का संकट
भीषण गर्मी, सूखते जलस्रोत, प्रदूषित हवा और अनियोजित विकास आज मानव सभ्यता के सामने अस्तित्व का संकट बनकर खड़े हैं। यह लेख पर्यावरण संतुलन के बिगड़ते हालात और धरती को बचाने की अनिवार्यता पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है।