कुंडलिनीः अवचेतन शक्ति सामर्थ्य
डॉ. श्रीगोपाल काबरा
क्या आप जानते हैं कि हमारे मनीषियों की कुंडलिनी की अवधारणा का आधार क्या था? उसकी शारीरिक परिकल्पना क्या थी?
आधार था आत्म अध्यन, चिंतन, तत्व ज्ञान, प्रज्ञा और दर्शन। अवधारणा थी अवचेतन में सुषुप्त आंतरिक ऊर्जाशक्ति की, असीमित शक्ति जिसे चिंतन, मनन और योग-साधना से जाग्रत किया जा सकता है। कुंडलिनी जाग्रत होने पर व्यक्ति सर्वशक्तिमान हो जाता है। उसे अलौकिक देवीय शक्ति प्राप्त हो जाती है।
इस सुप्त शक्ति की परिकल्पना थी, मेरु रज्जु को घेरे कुंडली मारे एक सांप की। केन्द्र में सुषुम्ना और दांयें बायें इडा और पिंगला नाड़ियों की। जननांगों से मस्तिष्क तक सात चक्रों की। हर चक्र में विशिष्ट भाव शक्ति की। भाव जो जाग्रत होने पर हर ऊपरी चक्र में परिष्कृत होते जाते हैं। श्रेष्ठ चक्र के जाग्रत होने पर ये भाव देवीय शक्ति का रूप ले लते हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसके समकक्ष अवधारणा और परिकल्पना उसका आधार।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में चरणबद्ध तरीके से अवधारणा और परिकल्पना का अनुसंधान, अन्वेषण कर सत्यापन किया जाता है। सत्यापित तथ्य निम्न हैं।
आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान में शरीर में अवचेतन प्रक्रियाओं के संचालन की अवधारणा ऑटोनोमिक नर्वस सिस्टम की है। मेरुरज्जु (स्पाइनल कॉर्ड), मेडुला, पोन्स, मिड ब्रेन में स्थित रेटिक्यूलर फोरमेशन और चेतन और अवचेतन मस्तिष्क के संधिस्थल पर स्थित लिम्बिक सिस्टम की है। लिम्बक सिस्टम जो भाव और यौन मस्तिष्क के रूप में हाइपोथेलामस के माध्यम से ओटोनोमिक नर्वस सिस्टम और अंतःस्रावी (एन्डोक्राइन) ग्रन्थियों का संचालन करता है। लिम्बिक सिस्टम जो चेतन और अवचेतन मस्तिष्क के बीच मध्यस्थता करता है, एक दूसरे के बीच सूचना सेतु का कार्य करता है और एक दूसरे को जाग्रत करने. शमन या उद्वेलित करने की क्षमता रखता है।
शास्त्रीय परिकल्पना में कुंडली-आकार सर्प के समकक्ष आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में सत्यापित है, मेरुदण्ड को घेरे सिम्पेथेटिक चेन और तंत्रिकाओं का जाल। नाडियों के समकक्ष हैं रेटिक्यूलर फॉर्मेशन के तंत्रिकाओं के पांच कॉलम (स्तंभ) और कुंडलिनी के 7 चक्रों की परिकल्पना के समकक्ष हैं मेडुला, पोन्स, मिडब्रेन और लिम्बिक सिस्टम के तंत्रिका चक्र। लिम्बिक लोब/सिस्टम की सरंचना तो है ही चक्रों के समूह की।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में परिकल्पना का आधार है भौतिक व प्रायोगिक सत्यापन। आधुनिक विज्ञान की उन्नत तकनीकों से तंत्र कोशिकाओं का सत्यापन। उनकी तंत्रिकाओं का सत्यापन। उनके कार्य का सत्यापन। उनके द्वारा स्रावित न्यूरोट्रांसमीटर्स रसायनों का सत्यापन और उनके प्रभाव का सत्यापन।
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कुंडलिनी की शास्त्रीय परिकल्पना में हर चक्र में निहित विशिष्ट भाव जाग्रत करने की अवधारणा के समकक्ष आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में पांच प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर स्रावित करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं के समूह और चक्रों का सत्यापन किया गया है।
कुंडलिनी की शास्त्रीय अवधारणा में 7 चक्रों में निहित बताये गए भाव हैं 1. मूलाधार चक्र में वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव 2, स्वाधिष्ठान चक्र जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि अवगुणों का नाश 3. मणिपूर चक्र के सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि दूर हो जाते हैं, 4. अनाहत चक्र सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक, और अहंकार समाप्त हो जाते है, प्रेम और संवेदना के भाव जाग्रत हो जाते हैं 5. विशुद्ध चक्र के जाग्रत होने पर भूख, प्यास और मौसम के प्रभाव को रोका जा सकता है, 6. आज्ञा चक्र के जागरण से सभी शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति सिद्ध पुरुष बन जाता है और 7. सहस्त्रार चक्र शरीर में अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युतीय संग्रह कर मोक्ष प्राप्ति का द्वार बन जाता है।
आधुनिक चिकित्सा में तंत्रिका कोशिकाओं और उनके तंत्र जाल का विधिवत सत्यापन, विश्लेषण, उनके विशिष्ट कार्य का आंकलन और कार्य संचालन के लिए कोशिका समूह द्वारा स्रावित विभिन्न न्यूरोट्रांसमीटर रसायन के आधार पर न्यूरोट्रांसमीटर संचालित चक्रों को चिन्हित किया गया है।
न्यूरोट्रांसमीटर स्राव एवं संचालन अनुरूप 1. कोलिनर्जिक (एसीटाइल कोलिन स्रावित करने वाले), 2. एड्रीनर्जिक (एड्रीनलीन, नोरएड्रीनलिन स्रावित/संचालित), 3. डोपामिनर्जिक (डोपामिन स्रावित), 4. सेरिटोनर्जिक (सेरीटोनिन स्रावित), 5. हिस्टामिनर्जिक (हिस्टामिन स्रावित), 6. गाबामिनर्जिक (गाबा अमाइनो ब्यूटरिक एसिड स्रावित) नामक प्रमुख तंत्रिका चक्र चिन्हित किए गये हैं। हर तंत्रिका चक्र की विशिष्ट कार्य क्षमता, उनके मनोभाव उद्वेलन की क्षमता को प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया गया है। ये न्यूरोट्रांसमीटर्स आज बतौर औषध उपयोग में लिए जा रहे हैं। उनके अत्याधिक स्राव के दुष्प्रभावों के शमन के लिए शामक औषधियां उपलब्ध हैं।
सुख, दुख, आनन्द, भय, क्रोध, लज्जा, चिंता, अवसाद, मोह, ममता आदि ही नहीं चेतना जगाने और चैतन्य रखने के न्यूरोट्रांसमीटर रसायन भी चिन्हिंत किए गये हैं। चिन्हित हर न्यूरोट्रांसमीटर विशिष्ट कार्य संचालन व भाव जाग्रत व उद्वेलित करता है। सोये हुए को जाग्रत विशिष्ट न्यूरोट्रांसमीटर ही करते हैं। चैतन्यता, एकाग्रता, कुशाग्रता का आधार न्यूरोट्रांसमीटर्स ही होते हैं।
कुंडलिनी की शास्त्रीय अवधारणा और उसकी संरचना की परिकल्पना में चक्रों, नाड़ियों की अवधारणा को रेटीक्यूलर फोर्मेशन की प्रामाणिक संरचना से बल मिलता है। लेकिन कुंडलिनी की अवधारणा की समग्रता के लिए ओटोनोमिक नर्वस सिस्टम, हाइपोथेलामस-पिट्यूटरी-एन्डोक्राइन सिस्टम और लिम्बिक सिस्टम भी अहम हैं। पौराणिक अवधारणा के अनेक आधार प्रामाणिक तथ्यों पर खरे नहीं बैठते।
डॉ. श्रीगोपाल काबरा
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