मम्मी रिटर्न्स: ए सी कोच एडिशन”
ए.सी. डिब्बे का सफर कभी-कभी थोडा सफ़रिंग वाला भी हो सकता है ।आप ये कह सकते हैं की अंगूर खट्टे वाली बात कही आपने तो l लेकिन आप मेरी इस रहस्य रोमांच से भरी दास्तान सुनेंगे तो यकीन मानिए आप भी भूत प्रेत आत्माओं आदि में विशवास करने लगेंगे l गाँव में मटोलन ताई थी l ( बाद में पता लगा की मटोली उस टाई का ससुर था न की पति ,इसलिए वो इस नाम से चिढती थी ) वो जब भूत-प्रेत और चुड़ैलों की कहानियाँ सुनाती थीं,तो हम दर के मारे ताई के पल्लू में अपने आपको छुपा लेते थे l लेकिन अब वो उतनी डरावनी और रोमांचक न लगती हैं , जितनी एक ए.सी. डिब्बे की रात की यात्रा लग सकती है। सच कहूँ तो, मैं तो सोचता हूँ कि रामसे ब्रदर्स को भूतहा हवेलियों में लालटेन लेकर भटकने की ज़रूरत ही क्या थी? अगर वे चाहें तो भुतहा हवेलियों के हजारों सालों से चौकीदारी कर रहे रामदीन काका के हाथों से लालटेन छीनकर उसे किसी ए.सी. कोच का चौकीदार बना दें l पूरी फ़िल्म को किसी ए सी ट्रेन के एक ही कोच में शूट कर सकते हैं । कम से कम हर मूवी में वही सीन—हजारों सालों का जंग लगा दरवाजा चिंघाड़ता हुआ खुलणा ,और रामदीन काका को लालटेन आगंतुक के मुँह के पास लाकर और बिना नाम पता पूछी ही.. पूछना , “चले जाओ यहाँ से…” ये सब नाटक तो नहीं होगा l
अगर थ्रिल्लिंग फिल्में स्क्रिप्ट की कमी से जूझ रही है तो , तो मेरे ए.सी. डिब्बे के संस्मरण से एक पूरी थ्रिलर फिल्म बन सकती है।इसमें मैंने गुंजाईश भी छोडी है..मम्मी रिटर्न्स 2 और 3 बनाने की …l
कई बार लगता है मानो ये सफर किसी नियर टू डेथ एक्सपीरियंस से कम नहीं। खासकर थर्ड ए.सी., जो मजबूरन हमारी जेब की औकात के हिसाब से भी सूट कर जाता है।
कल्पना कीजिए—रात के ठीक दो बजे। आप अकेले हैं।कोई छोड़ने भी नहीं आया आपको l जिस स्टेशन से ट्रेन पकड़नी है, वह आपके ही शहर का है, लेकिन चारों ओर सूना-सूना सन्नाटा पसरा हुआ। मजबूरी यह कि यही ट्रेन है जो पकड़नी है, दूसरी कोई ट्रेन नहीं।
ट्रेन धीरे-धीरे आती है, पटरियों पर उसके पहियों की चिंगाड़ सुनाई देती है। जैसे कोई घोड़ा हिनहिना रहा हो जिसे किसी जंगल में उलटी चुड़ैल पेड़ से लटकी दिख गई हो। अजीब-सी सिहरन पैदा होती है।
आप देखते हैं कि सारे दरवाज़े बंद हैं। जिस कोच में चढ़ना है, वह धीरे-धीरे आपकी आँखों के सामने से गुजरता हुआ दूर जाकर ठहरता है। सीटी बजती है। मुश्किल से दो मिनट का ठहराव है। आप अपनी पूरी बची-खुची ताकत झोंककर दरवाज़े तक पहुँचते हैं, जोर-जोर से खटखटाते हैं—
“अरे खोलो! ट्रेन छूट जाएगी…”
उस वक्त आपकी हालत वैसी ही होती है जैसे कोई भूत आपका पीछा कर रहा हो। तभी कोच अटेंडेंट आता है। उसका अंदाज़ भी किसी भूतहा बंगले के चौकीदार जैसा। लालटेन तो नहीं हाँ हाथ में टॉर्च लिए आपके चेहरे पर रोशनी मारता है। मन ही मन बुदबुदाता हैं—“यार, ये ट्रेन इन छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती ही क्यों है?”
वह ऊपर से नीचे तक आपकी शक्ल-सूरत और कद-काठी का मुआयना करता है। मानो अंदाज़ा लगा रहा हो कि कहीं जनरल डिब्बे का यात्री तो चुपके से नहीं चढ़ गया। फिर टिकट देख कर कन्फर्म करता है l भगवान का शुक्र है कि वो अंदर घुसने की इजाज़त दे दे ता है।
आप सामान को गलियारे में रखकर भीतर आते हैं। जैसे ही अंदर का दरवाज़ा खुलता है, धुंधली रोशनी और गहरा अंधेरा आपका स्वागत करते हैं। मोबाइल की टॉर्च जलाकर आप एक-एक सीट का नंबर खोजते हैं। वह दृश्य किसी मोहेंजोदड़ो लिपि को पढ़ने जैसा कठिन लगता है।उस लिपि को अपने टिकट पर अंकित लिपि से मिलान करना ,जैसे कोई पुरातत्ववेत्ता किसी गहरे रहस्य को डिकोड करने में लगा हो l
पूरा डिब्बा किसी मुर्दाघर की तरह प्रतीत होता है। हर बर्थ पर सफेद चादर ओढ़े यात्री मानो निढाल पड़े हुए शरीर लगते हैं। बस सांस चल सी रही है, बाक़ी सब अचल, निस्तब्ध। ऐसा डर लगता है कि कहीं आपकी हलचल या मोबाइल की रौशनी से कोई जाग न जाए, कहीं कोई आकृति उठकर आपके सामने खड़ी न हो जाए।
आप तुरंत मोबाइल को साइलेंट मोड पर डाल देते हैं। डर इस बात का भी रहता है कि अगर आपकी सीट पर कोई और सोया हुआ मिला तो क्या करेंगे?
इस सन्नाटे को तोड़ती है सिर्फ़ खर्राटों की गूँज। वही सबूत है कि ये शरीर अभी आत्माओं के साथ जुड़े हैं। नहीं तो दृश्य इतना भयावह कि लगे जैसे आप किसी रहस्यमयी पिरामिड में पहुँच गए हों, जहाँ हज़ारों साल पुरानी ममी चुपचाप पड़ी हों।
अगला मोड़…यानी कि अगली सीरीज –
अब आपके मन में यही सवाल कौंधता है—क्या मुझे मेरी सीट मिल गई? या कोई और रहस्य सामने आने वाला है?
यही पर पाठकों को इस रहस्यमयी तिलिस्म की दुनिया में छोड़ देना ही स्क्रिप्ट का असली कमाल है।एक गुंजाईश की अगली सीकेन्स का जुगाड़ हो ही गया l
अगर यह संस्मरण रोचक लगा, तो जुड़े रहिए अगले भाग के साथ—जहाँ इस थ्रिलर सफ़र की अगली परतें खुलेंगी।मम्मी रिटर्न्स: ए सी कोच एडिशन-2

✍ लेखक, 📷 फ़ोटोग्राफ़र, 🩺 चिकित्सक
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