युद्ध का चेहरा हमेशा बदलता है—इतना बदलता है कि कभी-कभी लगता है इतिहास वास्तव में सैनिकों का नहीं, तकनीक का जीवन-वृत्त है। पाँच हज़ार पाँच सौ साल पहले मिस्र के राजा नरमार के हाथ में जो भोथरी-सी गदा थी, वह किसी युद्ध का नहीं, बल्कि उस आदिम दुनिया की मासूमियत का प्रतीक थी। अधनंगा शरीर, न कवच, न रथ, न हाथी-घोड़े—मानो मनुष्य अपने शरीर को ही किले की तरह ढोता था। पर उस गदा से भी बड़ा हथियार नरमार के पास कुछ और था—लोगों का एकजुट होना, एक ही धुन, एक ही उद्देश्य। शायद आदिकाल का पहला “स्टेट”—राज्य—किसी युद्धभूमि में नहीं, बल्कि किसी डाकू सरदार की अड्डेबाज़ी से पैदा हुआ होगा। एक राय, एक इरादा, एक रणनीति, और उसके सामने असावधान शत्रु… यही युद्ध की पहली परिभाषा थी।
गाँवों की आज़ाद आबादी धीरे-धीरे किसी कंधे पर झंडा लिए हुए व्यक्ति के अधीन होने लगी। यह वो समय था जब सभ्यता ने पहला समझौता किया—“सुरक्षा” के बदले “स्वतंत्रता”। बस यहीं से शुरू हुआ राज्यों का सफ़र और उनके बीच की अनंत लड़ाइयाँ—भूमि के लिए, यश के लिए, स्त्रियों के लिए, धन के लिए… या कभी सिर्फ़ यह दिखाने के लिए कि “मेरे पास जो है, उससे बड़ा मेरे पड़ोसी के पास नहीं होना चाहिए।” और इन युद्धों में हर बार एक चीज़ विजेता तय करती रही—नई तकनीक।
जब किसी ने गदा की जगह नुकीला कांसे का भाला बनाया तो युद्ध की भाषा बदल गई। दूरी से वार करने वाला सदैव सुरक्षित रहा। कांसा लोहे में बदला, लोहा स्टील में। जिसने नया धातु अपनाया, उसने पुराने हथियार वालों का साम्राज्य छीन लिया। फिर घोड़े आए, कवच आए, किले आए, आक्रमण-यंत्र आए। मनुष्य ने दीवारें ऊँची बनाईं तो आक्रमणकारियों ने पत्थर फेंकने वाले कैटापल्ट बना लिए। फिर बारूद, फिर तोप, फिर रायफ़लें… और अंत में वो हथियार आया जिसने युद्ध को पहली बार “निशब्द” कर दिया—एटम बम।
पहला विश्वयुद्ध खाइयों में फँसा हुआ था। महीनों तक सैनिक वहीँ सड़ते रहे, एक-एक इंच ज़मीन के लिए मरते रहे। बीस साल बाद ही तकनीक ऐसी तेज़ी से भागी कि काग़ज़ देखते-देखते धुँआ हो गया। टैंक यूरोप के नक़्शे पर फर्राटे से दौड़ने लगे, विमानवाहक पोत समुद्र पर तैरते हवाई अड्डे बन गए। और एक सुबह आसमान से बरसती आग ने पर्ल हार्बर को राख में बदलकर दुनिया को बता दिया कि अब युद्ध केवल ताक़त नहीं, विज्ञान का खेल है।
लेकिन यह भी अब पुरानी बातें हो चुकीं। आज का युद्ध धरती पर नहीं, आसमान और अंतरिक्ष में लड़ा जा रहा है। सैटेलाइट आपकी साँस तक गिनते हैं, ड्रोन आपकी छत पर मंडराते हैं, AI आपकी खामोशी तक को पढ़ लेता है। इतने महंगे टैंक, जिन्हें बनाने में करोड़ों लगे, अब 200 डॉलर के ड्रोन गिरा रहे हैं। लड़ाई किलोमीटर में नहीं, मीटर-मीटर में टूट रही है। हाइपरसोनिक मिसाइलें आवाज़ की पन्द्रह गुनी रफ्तार से दौड़ती हैं—निशाना लगाना भी जरूरी नहीं—बस लोकेशन डालो और “फ़ायर” कर दो।
ऐसे समय में विमानवाहक पोत किसी समुद्र में धीमे-धीमे तैरता हुआ एक विशाल निशाना भर रह गया है। तेजस जैसे स्वदेशी सपने, जिनपर 1980 में काम शुरू हुआ, आज तक अधूरे पड़े हैं। राफेल की कहानी एक दशक से अधिक चली, और उड़ने के चंद घंटों में ही कितने गिरे—कोई ठीक-ठीक नहीं जानता। थलसेना 155mm तोप के लिए 40 साल से आत्मनिर्भरता का सपना देख रही है। परमाणु पनडुब्बियाँ एक-एक कर निष्क्रिय हो चुकी हैं। युद्ध की तैयारी ऐसे की जा रही है जैसे लड़ाई 1980 में होनी हो, जबकि बाहर दुनिया 2030 के युद्ध के लिए सांस रोककर खड़ी है।
लेकिन युद्ध का मूल सिद्धांत कभी नहीं बदला—जो पहले मारता है, दूर से मारता है, सस्ते में और सुरक्षित मारता है—वही जीतता है।
नरमार की गदा आज स्क्रैप होती है, कलाश्निकोव ज़ंग खाती है, टैंक कब्र बन रहे हैं, और नीति-निर्माता अब भी चुनाव के भाषणों में मिसाइलें खोज रहे हैं, इतिहास की समाधियों पर बम फोड़ रहे हैं। जनता मंच पर तालियाँ बजाती है, पर असली युद्ध उनमें नहीं—तकनीक में तय होते हैं।
तकनीक कभी भावुक नहीं होती,
न वह राष्ट्रगान सुनती है,
न किसी के भाषण से प्रभावित होती है।
वह बस एक ही भाषा बोलती है—
तेज़, क्रूर, और बेसुरी।
और युद्ध का चेहरा, हर बार उसी भाषा में अपना नया रूप बनाता है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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