आज सुबह जैसे ही व्हॉट्सऐप पर पहली ख़बर टपकी—“धर्मेंद्र नहीं रहे…”—मन वैसा ही भारी हो गया जैसे किसी पुराने, आत्मीय पड़ोसी की चौखट अचानक खाली दिख जाए। हमारी पीढ़ी के लिए धर्मेंद्र सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं थे; वे टंकी पर चढ़कर “अब जल्दी हाँ बोल दे बसंती!” कहने वाले वीरू भी थे, खेत में गेंहूँ बोते हुए रोमांस छिड़कने वाले किसान भी, और घर के बुज़ुर्गों के आगे सिर झुकाकर आज्ञाकारिता की परंपरा निभाने वाले देहाती युवक भी। एक आदमी—इतने चेहरे।
पर आज उन चेहरों में सन्नाटा है।
धर्मेंद्र सिंह देओल—8 दिसम्बर 1935 को पंजाब की मिट्टी में जन्मा वह बालक, जो स्कूल नहीं जाना चाहता था क्योंकि उसके पिता मास्टर साहब बराबरी से, बल्कि उससे भी ज़्यादा सख़्ती से डाँट देते थे। इसी बच्चे के भीतर कहीं यह सपना अटका पड़ा था कि फ़िल्मों की चकाचौंध वाली दुनिया में वह भी कूदेगा। माँ से कहकर फ़िल्मफ़ेयर के न्यू टैलेंट हंट में फोटो भेज दिए—और किस्मत ने दरवाज़ा चौड़ा खोल दिया।
1960 में “दिल भी तेरा हम भी तेरे” से शुरू हुआ सफ़र जब 1966 की “फूल और पत्थर” तक पहुँचा, तब तक धरम पाजी एक्शन हीरो बन चुके थे—ऐसे कि दर्शक सीट पकड़कर बैठते और परदे पर उनका हर पंच, हर छलाँग, हर ठोकर सिनेमा हाल में गूँज बनकर फैल जाती थी ।
वह आदमी जिसने हर तरह का किरदार जिया
मीना कुमारी, शर्मिला टैगोर, सायरा बानो, आशा पारेख, ज़ीनत—हर अभिनेत्री के साथ उनकी केमिस्ट्री में एक अलग चमक थी। लेकिन हेमामालिनी के साथ उनकी जोड़ी… बस, वही बात कि परदे पर प्यार हो तो रोशनी अलग ही पड़ती है। “सीता और गीता”, “जुगनू”, “ड्रीम गर्ल”—मानो किसी चिराग में तेल डालकर लौ को थोड़ा और स्थिर कर दिया हो।
और फिर शोले—जहाँ वीरू टंकी पर चढ़कर बसंती से शादी की भीख माँगता है। हमारे बचपन के मोहल्लों में जितने बच्चे टंकी पर चढ़कर यह डायलॉग बोलते मिले, शायद ही उतने बच्चे क्लास में कविता सुनाते दिखे हों।
प्रकाश कौर से शादी, फिर हेमामालिनी से प्रेम और विवाद—धरमजी के जीवन में उतार-चढ़ाव भी उतने ही फ़िल्मी थे जितने उनके किरदार। लेकिन सच यह भी है कि उन्होंने हर रिश्ते को निभाया, हर ज़िम्मेदारी को उठाया। अपने दोनों बेटों—सनी और बॉबी—को जिस तरह लॉन्च किया, वह एक पिता के गर्व की सबसे सजीव तस्वीर है।
दिलीप कुमार जैसे महानायक ने एक बार कहा था—“मेरी ख़ुदा से बस एक शिकायत है… उसे मुझे धर्मेंद्र जितना ख़ूबसूरत बनाना चाहिए था।”
यह लाइन ही बता देती है कि परदे पर उनका व्यक्तित्व कैसा चमकता था।
वक़्त बदला, वक्त के साथ किरदार भी बदले, पर चमक वही रही
“लाइफ़ इन ए मेट्रो” में उनका सधा हुआ, संजीदा अभिनय बताते हैं कि उम्र सिर्फ़ कैलेंडर पर दर्ज होती है,आदमी कि रूह पर नहीं । और राजनीति? जी हाँ, बीकानेर से सांसद बने—हालाँकि वहाँ उनकी कम बातचीत और ज़्यादा शर्मीली उपस्थिति ही चर्चा में रही।
यह भी एक विडंबना रही कि इतने विशाल कद के कलाकार को कभी “बेस्ट एक्टर” का फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड नहीं मिला। पर क्या अवॉर्ड हमेशा प्रतिभा नापते हैं? नहीं। कई लोग अवॉर्ड ले जाते हैं, कुछ इतिहास। धर्मेंद्र इतिहास ले गए।
आज जब हम उन्हें याद कर रहे हैं याद आता है उनका वह मासूम सा शरारती डायलॉग—
“आज मौसम बड़ा बेईमान है…”
आज सचमुच मौसम बेईमान है। हवा में कुछ नमी है, कुछ खामोशी है। परदे पर गूँजने वाला वह ठहाका, वह रोमांस, वह देहाती सौम्यता, वह पंजाबी दिल, वह ही-मैन—सब आज स्मृति बनकर बैठ गया है।
पर कलाकार कभी मरते नहीं।
धर्मेंद्र चले गए—पर जब भी कोई टंकी पर चढ़कर बोलेगा,
जब भी कोई खेत में प्रेम गीत गाएगा, जब भी कोई बूढ़ा अभिनेता 70 की उम्र में भी दिल से जवान दिखेगा—
वहाँ कहीं न कहीं धरम पाजी की परछाई मौजूद होगी।
श्रद्धांजलि, धर्मेंद्र साहब।
आप जैसे सितारे फिर नहीं आएँगे।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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