अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश – एक गीत
थकान की धूप में भी हम मुस्कान बोते हैं,
रातों की राख पर नयी सुबहें संजोते हैं,
इन सूनी आँखों में सपने हजार पलते हैं—
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
उँगलियाँ काँपती हों पर इरादा खड़ा रहता,
क्षत विक्षत हो तन ,फिर भी मन आगे बढ़ा रहता,
दर्दों की नदी में भी साहस के दीप जलते हैं ,
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
दुनिया की भीड़ में जब दृष्टि भरमाती है,
दया की धुंध अक्सर हमें विकल कर जाती है,
हम फिर भी सत्य की मशालें लिए चलते हैं
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
टूटी श्वास में भी सपनों की घंटी बजती,
कंपित पगडंडी पर भी मंज़िल की राह सजती,
हँसकर हर पतझड़ के भीतर बसंत भरते हैं —
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
रोकें यदि हवाएँ तो रुख़ अपना बदलते हैं,
कठिनाई की आँच में हम और निखरते हैं,
जीवन के रण में हर बाधा पार किये चलते हैं ,
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
मंज़िलें कभी हमें, कभी हम उन्हें बुलाते,
शब्दों में अपने दर्द को अमृत-सा मिलाते,
धरती से बँधे रहकर भी ऊँचाई से न डरते हैं
अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश लिए चलते हैं।
Comments ( 2)
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2 months agoNice one
दिव्यांग दिवस : अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश की उड़ान - Baat Apne Desh Ki
2 months ago[…] अपूर्ण देह में पूर्ण आकाश – एक गीत […]