विश्व दिव्यांग दिवस हमें याद दिलाता है कि मनुष्य की असल ताकत उसकी देह में नहीं, उसके मन में होती है। समाज अक्सर देह की अपूर्णताओं पर ज़ोर देता है, पर यह दिवस हमें यह देखने की दृष्टि देता है कि जहाँ शरीर थोड़ा रुक जाता है, वहीं आत्मा अपनी चमक से दुनिया को चकाचौंध कर देती है। दिव्यांग भाई–बहनों को अधिकार दिलवाना, योजनाओं तक पहुँचाना, उन्हें समानता और गरिमा का हिस्सा बनाना केवल सहानुभूति का कार्य नहीं—यह हमारे होने का, हमारे समाज के सभ्य होने का प्रमाण है।
ईश्वर ने यदि किसी का एक अंग कम किया है, तो बदले में उसे किसी अद्भुत दिव्य गुण से अवश्य सम्पन्न किया है। वह तेजस्विता, वह साहस, वह दृढ़ता—जो कई बार हम तथाकथित सामान्य लोग भी अपने भीतर नहीं पा पाते। हमारे धर्मग्रंथ और इतिहास उन विभूतियों से भरे पड़े हैं जिन्होंने अपनी सीमाओं को ही अपनी सबसे बड़ी शक्ति में बदल दिया। सूरदास दृष्टिहीन थे, लेकिन उनकी दृष्टि में कृष्ण की बाल लीलाएँ ऐसे उतरती थीं कि आज भी लोकजीवन उनके छंदों से आलोकित है। संत रामभद्राचार्य ने बिना दृष्टि के गीता और रामचरितमानस का वह अध्ययन किया कि ज्ञान स्वयं उनके सामने नतमस्तक हो। अरुणिमा सिन्हा ने कृत्रिम पैर के सहारे एवरेस्ट फतह कर दिया—यह दिखाते हुए कि पैर नहीं, हौंसले चढ़ते हैं। सुधा चंद्रन ने कृत्रिम पैर के साथ नृत्य में वह सौंदर्य रचा कि मंच भी मोहित हो उठा। वैज्ञानिक फेरंस हों या कई स्वतंत्रता सेनानी—इतिहास गवाह है कि दिव्यांगता ने कभी किसी के मार्ग में ताला नहीं लगाया; वह केवल रास्ते का आकार बदलती है, दिशा नहीं।
छीन गई नज़र, छीन गई श्रवण क्षमता, पर चुनौती से लड़ने की हिम्मत नहीं गई।
छीन गये हाथ, चलने की क्षमता कम हुई—पर पथरीले रास्तों पर रोज़ चलने का साहस आज भी अडिग है।
प्रतिभा गजब की है, साहस अदम्य है। माना हम दिव्यांग हैं, पर हौंसले बुलंद हैं।
कभी-कभी सहानुभूति का बोझ इतना भारी पड़ता है कि व्यक्ति खुद को कठपुतली-सा अनुभव करने लगता है। भीड़ में चेहरे गुम हो जाते हैं, संघर्षों का भार कंधों पर चढ़ता जाता है, और अतीत की यादें आँखों से गिरते अश्कों में बह जाती हैं। पर इन्हीं कठिन पलों में भीतर की रोशनी अचानक स्पर्श की हल्की-सी महक से खिल उठती है। कदम लड़खड़ाते हैं—लेकिन मंज़िल पाने की चाह लड़खड़ाने से नहीं मरती। इरादों की राह बाँधकर जब कोई दिव्यांग मनुष्य एक कदम आगे रखता है, तो नदियाँ भी अपनी दिशा बदल लेती हैं। प्रतिभा और साहस ऐसे ही होते हैं—वे किसी भी कमी को अपनी ऊर्जा से ढँक देते हैं, किसी भी अंधेरे को अपनी चमक से हर लेते हैं। हड़ताल, चोट, उपहास—कुछ भी उनकी उड़ान को सीमित नहीं कर सकता। वे अपूर्ण देह में भी पूर्ण आकाश लेकर चलते हैं।
विश्व दिव्यांग दिवस हमें यह देखने का अवसर देता है कि जो लोग जीवन की रेस में अपने पैरों से कम, अपने इरादों से ज़्यादा दौड़ते हैं—वे ही वास्तव में समाज को दिशा देते हैं। हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उन्हें दया नहीं, सम्मान दें; सहानुभूति नहीं, समानता दें; वायदे नहीं, अवसर दें। समाज की मुख्य धारा तभी पूरी होती है जब उसमें हर मनुष्य अपनी गरिमा के साथ शामिल हो—बिना इस अहसास के कि वह किसी कृपा के सहारे आगे बढ़ रहा है।
आज का यह दिवस हमसे एक ही बात कहता है—किसी भी दिव्यांग भाई–बहन की पहचान उसकी कमी नहीं है। पहचान है उसका साहस, उसकी मेहनत, उसकी रोशनी। हमें अपनी आँखें खोलनी होंगी ताकि हम उनकी दृष्टि को समझ सकें; अपने मन खोलने होंगे ताकि हम उनकी गरिमा को महसूस कर सकें। वे हमसे कम नहीं—कई बार हमसे कहीं ज़्यादा ऊँचे होते हैं।
दिव्यांग दिवस केवल एक तिथि नहीं, एक दृष्टिकोण है—यह देखने का नजरिया कि मनुष्य अपनी अपूर्णताओं के बावजूद कितना विराट हो सकता है। आइए, हम सब मिलकर उन्हें शुभकामनाएँ दें—और ईश्वर से प्रार्थना करें कि उनके हौंसले ऐसे ही प्रखर रहें, उनका मार्ग और भी उज्ज्वल हो, और उनका हर कदम उन्हें उस ऊँचाई तक ले जाए जहाँ पहुँचकर वे दुनिया को बता सकें कि सच्ची दिव्यता देह में नहीं, आत्मा में होती है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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