*बधाई हो, शर्मा जी अंकल बन गए!*
आज मोहल्ले में बधाइयों का दौर चल रहा है। हर कोई शर्मा जी के घर की ओर दौड़ा चला जा रहा है। वजह? अरे भाई, शर्मा जी के जीवन में एक नया “प्रमोशन” हो गया है। कल ही रास्ते में एक बच्ची ने शर्मा जी को पुकारा, “अंकल!”
अंकल की दहलीज़ पार करने की यह “शुभ” खबर जब शर्मा जी की पत्नी के कानों तक पहुंची, तो पहले तो वो ठहाका मारकर हंसीं, फिर बच्ची को धन्यवाद देते हुए बोलीं,
“मैं तो कब से कह रही थी इनसे कि अब तुम अंकल कहलाने की उम्र पार कर चुके हो, लेकिन ये सुनते ही नहीं।”
पर क्या करें, उम्र के इस पड़ाव पर चाहे जितना “हिजाब” लगा लें, चाँदनी की चादर तान लें, या दर्द निवारक जेल से घुटनों की जंग छुड़ा लें, लेकिन सच्चाई छुप नहीं सकती इन झूठे झमेलों से । शर्मा जी की रंग-रोगन से सजी पुरानी इमारत की देह से सठियापन की दुर्गंध आ ही जाती है।
क्या-क्या जतन नहीं किए उन्होंने!
एक से बढ़कर एक डाई मंगवाई। छाती के दो बाल, बौनी मूंछें, और सिर के एक-एक बाल को बार-बार काला किया। कई बार बाल रंगते समय मुंह पर भी कालिख लग गई, लेकिन सब सह लिया। आखिर जवानी और कालिख का रिश्ता जो है।
बुढ़ापा? सफेद… झक्क साफ! आदमी को डर लगता है सफेदपोश होने से, क्योंकि सफेदी में सब कुछ साफ नज़र आता है। शायद इसीलिए नेता लोग अपने कुर्ते में काली कमाई की कालिख लगवाते हैं।
शर्मा जी को देखो, सफेद बालों को ढूंढ-ढूंढकर जड़ से खींचते रहते हैं। लेकिन सफेद बाल की जड़ें भी मज़बूत होती हैं, इतनी आसानी से नहीं उउखड्ती ।
ठीक उसी तरह, जैसे कोई सफेद ईमानदारी का लबादा ओढ़े इंसान… हर कोई उसे जड़ से उखाड़ने की कोशिश करता है। सफेदी अंधेरे में भी चमकती है, और शायद इसी चमक से लोग डरते हैं।
वो लड़के भी शायद अंधेरे में ही पहचान गए थे,
“अंकल, आपकी सफेदी दिख रही है!”
सफेद बाल छुपाने के लिए इन्हें आप काले करते हो, वही बाल और तेजी से सफेद हो जाते हैं। शायद कालिख इंसान की असलियत जल्दी सामने लाना चाहती है। जितना उसे छुपाने की कोशिश करो, उतना ही वह दिखाने की।इतनी जल्दी तो काली कमाई भी सफ़ेद नहीं होती l
देखा है, कई डाई किए लोगों को… कालिख पोतने के चक्कर में पूरा सिर काला कर लेते हैं।
जितनी रिसर्च बुढ़ापे को जवानी में बदलने पर हो रही है, उतनी अगर जवानी को संभालकर रखने पर होती, तो शायद बुढ़ापा आता ही नहीं। शर्मा जी जैसे लोग हर रोज़ देशी वैद्य, नीम-हकीम, शंखपुष्पी का चूर्ण, अश्वगंधा, शिलाजीत तक की भस्म निगल रहे हैं। बस, अपनी खोई हुई जवानी के लिए विलाप कर रहे हैं।
लेकिन जब जवानी थी, तब परवाह नहीं की। सोच भी नहीं पाए कि बुढ़ापा कभी दस्तक देगा।
अब बुढ़ापा जब इनके दरवाजे पर आया, तो उसे डांटकर भगाने की कोशिश की। पर ये ससुर दरवाजे के पीछे से घुस आया और अब बिना बुलाए मेहमान की तरह आकर जम गया है।वाइल्ड कार्ड एंट्री कि तरह l
कैसे निकालें इसे बाहर? शर्मा जी परेशान हैं। हर रोज़ मेरे पास आते हैं और पूछते हैं,
“भाई साहब, विदेशों में जो रिसर्च चल रही है, उसमें कुछ निकला क्या? कोई दवा बनी हो, तो मुझे बताना!”
मैंने कहा, “यार शर्मा जी, आपको खुद सोचना चाहिए। बुढ़ापे के लिए सरकार ने कितनी सारी सुविधाएँ दी हैं। रेलवे में कंसेशन, हेल्थ स्कीम्स, पेंशनर्स की संस्थाएँ, यहाँ तक कि हंसने-हंसाने के लिए लाफ्टर क्लब तक। आप इनमें शामिल हो जाइए।”
लेकिन नहीं! शर्मा जी तो अब भी आशावादी हैं। शायद उन्हें उम्मीद है कि एक दिन बुढ़ापा थक जाएगा, अपनी हरकतों से बाज आएगा और खुद ही लौट जाएगा। बस मुँह लटकाकर वापसी करेगा।
ज़िंदगी में इंसान सब कुछ मांगता है—शादी, नौकरी, घर, गाड़ी… बस बुढ़ापा नहीं। लेकिन ये ससुरा बिना बुलाए आ ही जाता है ।
अब देखिए, शर्मा जी अभी भी बुढ़ापे के जाने का सपना देख रहे हैं। लगता है, उनका भरोसा उस दिन पर टिका है जब बुढ़ापा खुद शर्मा जी से ऊबकर उनका पीछा छोड़ देगा।
अब तो मोहल्ले वाले भी इस खास मौके का बस इंतजार ही कर रहे हैं। खासकर वो इंश्योरेंस एजेंट, जो जवानी में शर्मा जी को कवर देने के लिए उन्हें जल्दी मरने में फायदे गिनाकर बीमा करवाने के लिए उकसाते रहते थे। लेकिन शर्मा जी उन्हें डपटते हुए कहते, “यार, अभी तो हम जवान हैं। ये मरने-वरने की बातें करके खामखा हमारा मूड खराब मत किया करो।”
अब वही एजेंट उन्हें प्रीमियम भरने के गिने-चुने सालों के साथ जल्दी क्लेम भुगतान की गारंटी पेश कर रहे हैं।
इधर मोहल्ले के गंजेड़ों को तेल बेचने वाले सेल्समैन भी शर्मा जी के उजड़े हुए “चमन” को फिर से बहारों से महकाने का ऑफर लेकर आ गए हैं। हर कोई कह रहा है, “अंकल जी, अब तो बाल उगाने का आखिरी मौका है!”
मोहल्ले के लैब वाले भी अलग-अलग हेल्थ चेकअप पैकेज लेकर पहुँच गए हैं। कोई “जेरियाट्रिक” मेडिसिन की पूरी रेंज पेश कर रहा है, तो कोई “अर्ध-वार्षिक स्वास्थ्य निगरानी” का ऑफर लेकर आया है। शर्मा जी के “रोम-रोम” की जाँच करने के लिए सब आतुर हैं।
मोहल्ले की वो महिलाएँ, जो खुद को अब तक “आंटी” कहलाने से बचाए हुए थीं, शर्मा जी के अंकल बनने की खबर से राहत की साँस ले रही हैं। अब वे बिना किसी झिझक के शर्मा जी की गूढ़ निगाहों के दायरे में सुरक्षित आ-जा सकती हैं।
दिल-ए-दर्द तो शर्मा जी का कब का “दर्द-ए-घुटना” बन चुका है। सिर्फ घुटना ही नहीं, शरीर के न जाने कौन-कौन से अंग इस दर्द का हिस्सा बन चुके हैं। दिल ने कभी इकरार किया या नहीं, लेकिन शरीर के सभी अंग आवाज कर-करके शर्मा जी की करवट के साथ इज़हार करते रहते हैं। अब तो ऐसा लगता है, दिल भी किसी “सिल्वर सिटीजन” क्लब में अपनी सदस्यता ले चुका है।
अब हर तरफ से बधाइयाँ ही बधाइयाँ हैं। रिश्तेदार भी शर्मा जी के बेटे-बेटियों के लिए “लाइफ पार्टनर” तलाशने की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हो गए हैं।
लेकिन शर्मा जी खुद अपनी “फाइल” लेकर सीधे ऊपरवाले के ऑफिस में लग गए हैं।
तनिक मुस्कराइए शर्मा जी, आप पर बधाइयों की बरसात हो रही है। मोहल्ले वालों ने तो आधिकारिक रूप से घोषणा कर ही दी है—”शर्मा जी अब अंकल बन गए हैं!”
डॉ मुकेश असीमित

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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