बधाई हो बधाई-हास्य व्यंग्य रचना

बधाई हो बधाई

आय हाय …“बधाई हो… बधाई!”
एक विशेष प्रकार की ताली मुद्रा के साथ जब यह आवाज सुनाई दे और उधर से आवाज़ —
“ओ री बुआ , दरवाज़ा बंद कर लो!

खिड़की के शीशे चढ़ा लो!

सुनो, तुम तो ऊपर की सीट पर सो जाओ… मैं कह दूँगी कि हम अकेले सफर कर रहे हैं!”

जब ऐसे डरे-सहमे वाक्य किसी घर ,मोहल्ले या ट्रेन की बोगी में गूंज जाएँ, तो समझ लीजिए —
आ गए हैं बधाई के ठेकेदार!
किन्नरों का वह पूरा दस्ता — जो बधाई के बदले वसूली का धंधा करता है।

बधाई जैसा सरल, मासूम, संस्कारों से लिपटा शब्द आजकल इतना संदिग्ध हो चुका है कि सुनते ही दिल दहल उठता है। पहले तो लोग इसलिए घर में खुशियाँ लाते थे कि “बधाई” मिलेगी,गवेंगी या न्योछावर होंगी । बधाई मिलेगी तो सीना फूलकर 56 इंच का लगेगा। शादी हो, बच्चा हो, गृह-प्रवेश हो — मोहल्ले की काकी, चाची, ताई बैठकर बलैयाँ लेतीं और गाती , बच्चे की किलकारी में ईश्वर की आहट सुनाई देती थी। 16-16 बतासे तक बँटते थे जी ।

वह दौर गया जी…
अब बधाइयाँ किसी भाव की नहीं,
एकमुश्त ठेके पर चलने वाला संगठित धंधा हैं।

आमतौर पर 8–10 का पूरा जथ्था आता है,उनमे से कितने असली कितने फर्जी आप चेक नहीं कर सकते l  मोहल्ले में ऐसे प्रवेश करता है जैसे कोई वसूली गिरोह धावा बोल रहा हो। उनके आते ही मोहल्ले में खुसर-पुसर शुरू —
“कौनसा घर?”
“अरे, चार घर छोड़कर… आज ही अस्पताल से आए हैं…”
कोई न कोई पड़ोसी — जिसका अपना कभी कट चुका होता है — खबर दे  ही देता है।

हमारे पड़ोस के शर्मा जी को पुत्ररत्न प्राप्त हुआ। अभी अस्पताल से घर लेकर आये ही कि किसी जलनखोर ने  इस बधाई-गैंग को फोन कर दिया , अगले ही घंटे ढोल-नगाड़ों का “विशेष दस्ता” उनके दरवाज़े पर खड़ा था।
गाली, आशीर्वाद और दुआ-बददुआ के घालमेल वाला तड़का लगाकर बोले —
“लाओ बच्चा… दिखाओ!”
मानो नवजात नहीं, कोई फ्लैगशिप मॉडल लॉन्च कर रहे हों।

लाओ जी..
“हमारी दर 31 हज़ार है। एक पैसा कम नहीं। हमारी रेटिंग गिरती है।”

शर्मा जी के पिता-दादा हाथ जोड़कर मिनती करने लगे —
“भइया, थोड़ा कम ले लो… गरीब हैं… अभी तो बहिन-बेटी को भी देना है… इतना तो हमने उनके लिए भी नहीं किया!”
कह दिया — “मत दो!”
दादा जी ने हारकर कहा —
“रहने दो… तुम्हारी दुआ नहीं चाहिए।”

उधर से तुरंत वार —
“सोच लो दादा… दुआ नहीं देंगे पर बददुआ भारी पड़ेगी!”
इतना कहकर जो हाथ बढ़ाया गया था, उसमें शराफ़त नहीं — चेतावनी चमक रही थी।

दादा जी ने 2100 पकड़ा दिए।
लेकर पैसे दादा जी के ही माथे पर उछालकर फेंक गए।
अब हाल यह है —
दरवाज़ा बंद, खिड़की के पर्दे बंद, बच्चे को चुप कराओ, फोन साइलेंट करो और पूरा परिवार “डोंट मूव” की मुद्रा में जम जाए।
क्योंकि बधाई कोई भावनात्मक रस्म नहीं —
पूरी इंडस्ट्री है।

जहाँ पहले किलकारियाँ गूँजती थीं, वहाँ अब हल्की फुसफुसाहट —
“सो जा बेटा… नहीं तो बधाई वाले आ जाएँगे…”
पूरी तरह शोले का डाकू-सीन याद दिलाता हुआ।

और अब देखिए भारतीय रेल का दृश्य।
पहले डकैतियाँ गाँव-मोहल्लों में होती थीं, अब ट्रेन में —
नए रूप में, नए ढंग से।

ट्रेन की बोगी में आदमी चाहे जितना वीर हो — नेता, पहलवान, इंस्टा-मोटिवेशनल स्पीकर —
पर जैसे ही बधाई-गिरोह की वह “विशेष मुद्रा” वाली टोली “आय-हाय” की लहराहट के साथ डिब्बे में प्रवेश करती है, अच्छे-अच्छों की आत्मा तकनीकी खराबी से शरीर से बाहर निकलने लगती है।
बोगी में पहले हवा रास्ता बदलती है, फिर यात्री।

सबसे पहले ये कपल पर टूटते हैं।
और अगर कपल के साथ “प्रोडक्ट” यानी बच्चा भी हो तो बस, समझिए —
लाइफ-टाइम वारंटी का कार्ड इन्हीं से जारी होगा!

अकेला आदमी बच सकता है, पर पत्नी-प्रेमिका साथ हो तो मर्द की बहादुरी ऐसे पिघलती है जैसे जून की धूप में अमूल बटर।

“बधाई हो जी…”

और बोगी में फिर वही आवाज़ —
“आये-हाय… कहाँ छिप रहे हो मुए… सज रही मेरी अम्मा लालन गोटे में!”


“अरे क्यों मुँह नीचा किए बैठे हो? मर्द बनते हो? नहीं बनते तो हमारी जमात में आ जाओ!”

“भाभीजी, देखो आपका आदमी कितना शरमाता है… हम तो बस दुआ देने आए हैं…”

आप कहें — “भाई, आगे बढ़ो।”आप अपनी जेब उलट कर दिखाते हैं l निरीह असहाय से आशंकित और  आतंकित भाव आपके चहरे  पर l
कानून? सरकार? प्रशासन?
सब मौन।
मानो इस व्यापार को अनौपचारिक सरकारी मान्यता मिल चुकी हो।

मोहल्ले वाले भी अब “सेटलमेंट मॉडल” पर चल रहे हैं —
अब लोग खुशियों का नहीं,
बधाई–वसूली का बजट बनाते हैं।

और मजे की बात —
सोशल मीडिया पर बस जरा सा लिख दो कि इस संगठित “बधाई-उद्योग” में सुधार चाहिए —
तो प्रगतिशील वर्ग टूट पड़ता है —
“सर, यह तो LGBT के खिलाफ है!”
भाई, कम्युनिटी पर कौन बोल रहा है?
मैं तो उस “बधाई-व्यापार प्रबंधन” पर बोल रहा हूँ जो ट्रेन से लेकर मोहल्ले तक एक-सा चलता है।

सच यह है —
आज बधाई देना नहीं, बधाई सहना बड़ा काम है।
और शायद शादी करने, बच्चा पैदा करने में जो मोहभंग बढ़ा है —
उसमें इस वसूली-गैंग का भी पूरा हाथ है।

कभी सोचा था — खुशी आएगी तो घर महक उठेगा ।
आज सोचते हैं —ढोल न बज जाएँ कहीं…
क्योंकि अब बधाई पहले नहीं आती —
उससे पहले “बधाई का इनवॉइस” आ जाता है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 2)

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डॉ मुकेश 'असीमित'

1 month ago

आपकी बधाई विनम्र भाव से स्वीकार है ,आत्मीय आभार आपका..
आपने रचना पढी उस पर प्रतिक्रिया दी..रचना सार्थक हो गयी

Dr Meenu Agarwal

1 month ago

बधाई हो मुकेश जी 👏👏👏👏

अरे नहीं नहीं 🤫🤫🤫🤫
बहुत धीमे सुर में दूंगी बधाई,
कहीं invoice न आ जाय आपके पास😃😃😂😂