ओपेनहाइमर : हीरो, विलन और बीच में फँसा एक बेचैन ज़मीर

क्रिस्टोफर नोलन की ओपेनहाइमर को अगर सिर्फ “एटॉमिक बम पर बनी फिल्म” समझकर टिकट लिया है, तो शुरू के कुछ ही मिनटों में महसूस हो जाता है कि गलती बम के हॉल में नहीं, अपनी उम्मीदों में हुई है। यह फिल्म धमाके के बारे में कम है, उस दिमाग और उस ज़मीर के बारे में ज़्यादा है जिसने पहला एटॉमिक धमाका संभव किया – और फिर उसी की गूँज में पूरी उम्र जलता रहा। नोलन इस बार अपने पुराने “दिमाग घुमाने वाले” फार्मूले से थोड़ा हटकर काम करते हैं। इंसेप्शन और इंटरस्टेलर की तरह यह कोई पहेली नहीं, बल्कि एक बेचैन, जटिल, नैतिक द्वंद्व से भरी बायोपिक है – आधी कोर्टरूम ड्रामा, आधी वैज्ञानिक यात्रा, और ऊपर से दर्शन की मोटी परत चढ़ी हुई।

अधिकतर दर्शक थिएटर जाते समय एक ही सवाल लेकर जाते हैं – ट्रिनिटी टेस्ट कैसे दिखाएँगे? असली धमाका कैसा होगा? और नोलन शरारत से मुस्कुरा कर जैसे कहते हैं – धमाके तो दिखाऊँगा, पर बाहर नहीं, तुम्हारे अंदर। फिल्म का केंद्र हिरोशिमा–नागासाकी पर गिरते बम नहीं, बल्कि वह आदमी है जो न्यू मैक्सिको के रेगिस्तान में खड़ा होकर अपने बनाए हुए सूरज को पहली बार उगते देखता है और उसके होंठों पर गीता की पंक्ति आती है – “Now I am become Death, the destroyer of worlds.” यह पंक्ति हम सिनेमा और डॉक्यूमेंट्री में कई बार सुन चुके हैं, लेकिन नोलन पहली बार इसका बोझ दिखाते हैं। एक वैज्ञानिक, जिसने बचपन से समीकरणों, खनिजों, तारों में अपना ईश्वर खोजा, अचानक महसूस करता है कि उसके हाथ में जो ज्ञान था, वही अब प्रलय का औज़ार बन चुका है।

फिल्म ओपेनहाइमर के बचपन और युवावस्था से शुरू होती है – 10 साल की उम्र में हाई लेवल फिजिक्स पढ़ने वाला, 12 साल में मिनरलॉजी क्लब में लेक्चर देने वाला, हार्वर्ड में चार साल की डिग्री तीन साल में खत्म करने वाला चमत्कारिक छात्र। नोलन इन सारी उपलब्धियों को घमंड के एलबम की तरह नहीं दिखाते, बल्कि अकेलेपन की पृष्ठभूमि की तरह इस्तेमाल करते हैं। कहीं पर वह संवाद आता है – “I need physics more than friends.” यही लाइन फिल्म का पहला दार्शनिक बीज है; जब इंसान रिश्तों की जगह विचारों से प्यार करने लगे, तो उसके फैसले भी इंसानी कीमतों से ज़्यादा वैचारिक हो जाते हैं। ओपेनहाइमर के जीवन में राजनीति देर से प्रवेश करती है। हिटलर का उदय, जर्मन–यहूदी वैज्ञानिकों का अमेरिका की ओर भागना, आइंस्टीन, फर्मी, टेलर, सज़ीलार्ड जैसे नामों का चलन – ये सब फिल्म की पृष्ठभूमि में इस तरह रखे गए हैं कि धीरे-धीरे यह साफ़ हो जाता है: एक “सिर्फ लैब तक सीमित” वैज्ञानिक अब यह समझने लगता है कि उसकी केमिस्ट्री और फिजिक्स के बाहर भी एक दुनिया है, और वहाँ भी आग लगी हुई है। यहीं से वह उस पतली रेखा पर आकर खड़ा होता है – अगर नाज़ी पहले एटॉमिक बम बना लें तो? ऐसे में बम बनाना पाप होगा या कर्तव्य?

फिल्म का बड़ा आकर्षण यही है कि पूरे तीन घंटे में नोलन कभी साफ़-साफ़ नहीं बताते कि ओपेनहाइमर हीरो है या विलन। एक तरफ वही आदमी है जिसने दुनिया का पहला एटॉमिक बम डिजाइन किया, ट्रिनिटी टेस्ट करवाया, और जिसकी “क्रिटिकल मास” की गणनाओं के दम पर हिरोशिमा और नागासाकी राख बन गए। दूसरी तरफ वही आदमी है जो युद्ध के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमैन से मिलकर कहता है – “I have blood on my hands.” ट्रूमैन इस बात पर इतना भड़कता है कि उसे कमरे से ही निकलवा देता है; सत्ता के लिए ज़मीर की बातें हमेशा असहज करने वाली होती हैं। फिल्म भर में यह संघर्ष चलता रहता है – क्या ओपेनहाइमर ने ‘necessary evil’ किया या ‘अक्षम्य पाप’? नोलन कोई भाषण नहीं देते, न नारे लगवाते हैं, वे सिर्फ घटनाएँ और चेहरे दिखाते हैं और फैसला दर्शक के विवेक पर छोड़ देते हैं।

भारतीय दर्शक के लिए फिल्म में एक अतिरिक्त स्तर काम करता है – ओपेनहाइमर का भगवद्गीता से रिश्ता। यह सिर्फ एक कोटेशन डाल देने की चतुराई नहीं है, बल्कि नोलन दिखाते हैं कि यह आदमी सचमुच संस्कृत पढ़ता था, मूल गीता को पढ़कर उसे अपने जीवन की सबसे प्रभावशाली किताब कहता था। महाभारत में अर्जुन युद्धभूमि पर खड़ा है – धनुष उसके हाथ में, पर मन में भारी संशय। उसके सामने अपना कुटुंब, गुरु, संबंधी। यहाँ ओपेनहाइमर आधुनिक अर्जुन बन जाता है – हाथ में एटॉमिक बम की स्कीमेटिक्स, दिमाग में वही प्रश्न – जो मैं करने जा रहा हूँ, वह सिर्फ रणनीतिक विजय है या आध्यात्मिक आत्महत्या भी? ट्रिनिटी टेस्ट के बाद जब वह गीता की पंक्ति दोहराता है, तब लगता है कि अक्सर हम जिस दर्शन से खुद को मजबूत बनाना चाहते हैं, वही बाद में हमारे खिलाफ गवाही देने लगता है। ओपेनहाइमर के लिए गीता अब प्रेरणा नहीं, एक स्थायी अपराधबोध का सबूत बन जाती है।

फिल्म का लगभग आधा हिस्सा किसी सुपरहीरो फिल्म की तरह नहीं, बल्कि लंबा खिंचा हुआ कोर्टरूम या कमिशन ड्रामा है। बंद कमरा, टेबल, कागज़, माइक्रोफोन और उस कुर्सी पर बैठा आदमी जिसके दिमाग की मदद से अमेरिका ने युद्ध जीता – और अब वही सिस्टम उसकी निष्ठा पर सवाल खड़े कर रहा है। कम्युनिस्ट दोस्तों के नाम, पत्नी की सोच, भाई की विचारधारा – सब उसके खिलाफ सबूत की तरह पेश किए जाते हैं। यहाँ नोलन एक और सवाल उठाते हैं – क्या कोई मनुष्य हमेशा के लिए “राष्ट्रभक्त” साबित रह सकता है, या सत्ता की नज़र में हर आदमी एक संभावित संदिग्ध है? रॉबर्ट डाउनी जूनियर का किरदार स्ट्रॉस, इस राजनीतिक खेल का चेहरा है – कभी दोस्त, कभी संरक्षक, और अंत में ठंडा, चालाक विलन, जो इतिहास की कथा अपने हिसाब से लिखवाना चाहता है। यहाँ भी वही पतली रेखा दिखती है – किसका देशप्रेम असली है? वह जिसने बम बनाया, या वह जिसने बम बनाने वाले को बदनाम किया?

इस सारी राजनीति और नैतिकता के बीच नोलन का सिनेमा की भाषा पर नियंत्रण कमाल का है। जो दर्शक सिर्फ “धमाका” देखने आए हैं, उन्हें यह तीन घंटे कई जगह “हिस्ट्री क्लास” जैसे लग सकते हैं, पर जो थोड़ा ठहरकर देखते हैं, उन्हें समझ में आता है कि यहाँ CGI नहीं, कॉन्शियसनेस फोड़ी जा रही है। ट्रिनिटी टेस्ट का दृश्य अद्भुत है – सन्नाटा, चमक, बादल, और फिर देर से आते हुए साउंड वेव्स – पर उससे भी ज़्यादा असरदार वे छोटे-छोटे दृश्य हैं जहाँ कोई धमाका नहीं, सिर्फ ओपेनहाइमर की आँखों में चल रहा तूफ़ान दिखाई देता है। तालियाँ बजाती भीड़, पर उसके कानों में चीखें; विजय-समारोह में उसका भाषण, पर उसके दिमाग में पिघलते शरीर, उखड़ती त्वचा की काल्पनिक छवियाँ। एक तरफ मेडल, दूसरी तरफ “blood on my hands” की कसक। फिल्म बार-बार यह स्थापित करती है कि असली नरक बाहर नहीं, भीतर बनता है – स्मृतियों, सपनों और ग्लानि में।

किलियन मर्फी का चेहरा इस फिल्म में किसी विज़ुअल इफेक्ट से कम नहीं। नोलन कैमरा उनके क्लोज–अप पर टिका देते हैं और जैसे तीन घंटे तक एक ही सवाल दोहराते हैं – तू हीरो है या विलन? हर सीन में उनकी आँखें अलग जवाब देती हैं – कहीं गर्व, कहीं डर, कहीं घमंड, कहीं ग्लानि। रॉबर्ट डाउनी जूनियर को बिना आयरनमैन सूट के देखना अपने आप में रोचक है; शुरू में वे एक सम्मानित, थोड़ा हास्यप्रद–से अफसर लगते हैं, धीरे–धीरे कहानी खुलती है और अंत में महसूस होता है कि असली खेल तो कहीं और रचा गया था। बैकग्राउंड स्कोर, काले–सफेद और रंगीन टाइमलाइन का इंटरकट, तेज़ एडिटिंग – सब मिलकर यह स्पष्ट कर देते हैं कि नोलन ने इस बार “मास एंटरटेनमेंट” नहीं, “मास–डिस्कंफर्ट” बनाने का जोखिम लिया है।

फिल्म खत्म होने के बाद दिमाग में एक ही बात बार–बार लौटती है – क्या विज्ञान तटस्थ होता है या हर ज्ञान के साथ एक नैतिक ज़िम्मेदारी पैक होकर आती है? ओपेनहाइमर न तो अपने नायक को महान मसीहा बनाती है, न दानवी खलनायक; वह उसे भयावह रूप से मानवीय आदमी के रूप में छोड़ देती है – जो अपने समय, अपनी राजनीति, अपनी महत्वाकांक्षा, अपने डर और अपने पछतावे, सबके योगफल का नाम है। हीरो और विलन के बीच की पतली रेखा यहीं साफ़ होती है – हीरो वह है जो खुद को कटघरे में खड़ा कर सवाल पूछता है, विलन वह जो अपने ऊपर केस ही नहीं चलने देता। ओपेनहाइमर ने दुनिया को यह सिखाया कि एटॉमिक बम जैसी चीज़ें शायद सिर्फ एक बार फटती हैं, लेकिन उनका दर्शनशास्त्र पीढ़ियों तक गूँजता रहता है। किसी भी अच्छे सिनेमा की तरह यह फिल्म भी जवाब नहीं देती, असहज करने वाले सवाल देकर लौटती है – और शायद आज की शोर भरी, आसान जवाबों वाली दुनिया में यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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