वंदे मातरम के 150 वर्ष: एक गीत नहीं, राष्ट्र-धड़कन का उत्सव

वंदे मातरम के 150 वर्ष: एक गीत नहीं, राष्ट्र-धड़कन का उत्सव

वंदे मातरम को 150 वर्ष पूरे हो गए—सुनने में यह एक “तारीख़” लगता है, पर सच यह है कि यह तारीख़ नहीं, एक धड़कन का जन्मदिन है। किसी सामान्य गीत के 150 साल पूरे हों तो हम उसे “संगीत-इतिहास” कहकर फाइल में रख देते हैं, पर वंदे मातरम उन दुर्लभ गीतों में है जो फाइलों में नहीं, लोगों की नसों में चलता है। जैसे किसी अच्छी फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर बस एक नोट बजते ही पूरा सीन याद करा देता है—वैसे ही वंदे मातरम का एक टुकड़ा बजते ही भारत का पूरा स्वतंत्रता-संग्राम आँखों के आगे चलने लगता है। फर्क बस इतना है कि फिल्म के स्कोर से रोमांस जागता है, और वंदे मातरम के स्कोर से राष्ट्र-जागरण।

कभी यह गीत उस भारत का “बैकड्रॉप” था जो काँधार से बर्मा तक, कश्मीर से केरल तक एक साथ हिल उठता था—और आज वही गीत बहसों के “स्टूडियो” में बैठा दिया गया है। दुख यहीं से शुरू होता है। जो मंत्र कभी लाठियों के बीच भी ऊँचा बोला जाता था, उसे अब “कंटेंट” बनाकर काट-छाँट के, अपनी-अपनी राजनीतिक कॉन्स्टिट्यूएंसी को एड्रेस करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यही बात एक सामान्य भारतीय को भी चुभती है, और साहित्य में रुचि रखने वाले को तो और ज़्यादा—क्योंकि साहित्य का काम जोड़ना है, और राजनीति का अक्सर काम—टुकड़ों में बाँटकर जोड़ने का अभिनय।

वंदे मातरम की यात्रा समझनी हो तो 1870–80 के दशक में लौटना पड़ेगा, जब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने आनंदमठ की रचना की। वह उपन्यास परतंत्रता के बीच विद्रोह-चेतना का वह दरवाज़ा था जिसे अंग्रेज़ किसी भी भाषा में खुलने नहीं देना चाहते थे। बंकिम बाबू सरकारी नौकरी में थे—कोई छोटी-मोटी नहीं—फिर भी उन्होंने वह साहस किया जो पद के आराम से नहीं, आत्मा की बेचैनी से पैदा होता है। और जो लोग आज इसे किसी धर्म-विशेष या जाति-विशेष की संपत्ति बताकर छोटा करना चाहते हैं, उन्हें आनंदमठ की दुनिया ठीक से पढ़नी चाहिए—जहाँ संघर्ष में विविध समुदायों की हिस्सेदारी का संकेत मिलता है। वंदे मातरम का भाव किसी एक समुदाय की दीवार नहीं, साझा माटी की छत है।

इतिहास गवाह है कि वंदे मातरम केवल किताबों में नहीं रहा। 1907 के लाहौर अधिवेशन से लेकर 1908 में तमिलनाडु (तूतीकोरिन) के मजदूर आंदोलनों तक, लोकमान्य तिलक की गिरफ्तारी के विरोध-प्रदर्शनों तक—जहाँ-जहाँ जन-हृदय में आज़ादी धड़कती थी, वहाँ वंदे मातरम की गूंज मिलती थी। और एक सवाल यहाँ अपने आप उठता है: परतंत्र भारत में जब किसी धर्म के व्यक्ति ने भारत-माता की इस वंदना का विरोध नहीं किया, तो स्वतंत्र भारत में विरोध करके आप आखिर क्या पाना चाहते हैं? आज़ादी के बाद हमारे पास अधिकार बढ़े, पर क्या समझ घट गई?

कभी-कभी उत्तर हमें बहुत छोटे प्रसंगों में मिल जाता है। जैसे एक बड़े अख़बार-समूह के मालिक भाई—जिनका फिल्मी दुनिया से भी नाता रहा—अपनी बेटी की शादी में किसी सुपरहिट गाने पर नहीं, एक बुंदेली लोक-गीत पर नाचते हैं। सामने फिल्म स्टार बैठे हों, सेलिब्रिटीज हों, फिर भी तालियाँ इसलिए बजती हैं कि वे अपनी जड़ों को याद कर रहे हैं—“यह हमारे पिता का फेवरेट गीत था।” अब सोचिए, हमारे पूर्वजों का एक “फेवरेट सॉन्ग” है—वंदे मातरम—और हम उसी पर लड़ रहे हैं कि इसे गाना चाहिए या नहीं। यही तो हमारी आधुनिकता का सबसे मज़ेदार (और सबसे दुखद) व्यंग्य है: जड़ों की बात हम मंच से करते हैं, पर जड़ों पर पानी डालने से डरते हैं।

वंदे मातरम के शब्दों में लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा जैसे प्रतीक आते हैं—और यहीं से “विवाद-उद्योग” को कच्चा माल मिल जाता है। पर यह समझना होगा कि ये प्रतीक किसी देवता-विशेष की राजनीति नहीं, भारतभूमि की शक्तियों के रूपक हैं—विद्या, समृद्धि, और साहस। बंकिम बाबू ने उस युग की भाषा में राष्ट्र को “माता” कहा; वे “सेक्युलर क्लॉज” लिख ही नहीं सकते थे—क्योंकि उस दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक शब्दावली ही अलग थी। “माता भूमि पुत्रो अहम्” जैसी परंपरा का यही साहित्यिक विस्तार था—जिसमें भूमि माँ है और हम उसकी संतान।

और इस 150वें वर्ष पर सबसे जरूरी बात यह है कि वंदे मातरम को केवल बहस से नहीं, अभ्यास से बचाया जाए। इसे गाने की जगह “गवर्नेंस” का मुद्दा बनाकर छोड़ देंगे तो यह गीत नहीं बचेगा, बस उसके पक्ष-विपक्ष के पोस्टर बचेंगे। होना यह चाहिए था कि गली-गली, चौराहे-चौराहे, हर पार्टी, हर धर्म, हर जाति—सब मिलकर इसे गाते, जैसे कभी अंग्रेजों का “ब्लड प्रेशर” बढ़ जाता था। क्योंकि प्रतीक किसी सरकार की संपत्ति नहीं होते; प्रतीक पीढ़ियों की विरासत होते हैं।

150 वर्ष पूरे होना उत्सव है—और उत्सव का अर्थ यही है कि हम स्मृति को “विवाद” नहीं बनने दें। वंदे मातरम को गाइए—पूरे मन से, पूरे स्वर से—क्योंकि यह सिर्फ़ एक गीत नहीं, भारत की सामूहिक आत्मा का वह स्वर है जो हर दौर में यही कहता है: “माँ, मैं तुझे प्रणाम करता हूँ।”

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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