अब जब धुरंधर के पीछे देश ऐसे दौड़ पड़ा है जैसे यह फिल्म नहीं, कोई राष्ट्रीय परीक्षा हो—और जिसने नहीं देखी, वह नागरिकता के संदेह के घेरे में आ जाएगा—तो मुझे भी लगा कि इस बहती गंगा में हाथ धो लेना चाहिए। हालाँकि सच यह है कि कुछ दिन तक मैं उसी पारंपरिक भ्रम में रहा—“यार, हाइप है… देख लेंगे।” लेकिन जब हर दूसरा यूट्यूबर, हर तीसरा न्यूज़ चैनल और हर चौथा व्हाट्सएप ग्रुप धुरंधर का पोस्टमार्टम करने लगा, तो FOMO सी फीलिंग आने लगी —“यार कहीं इस दौड़ में पिछड़ न जाएँ ।”
छोटे शहर में रहने का एक अद्भुत लाभ यह है कि आप मल्टीप्लेक्स की लक्ज़री पीड़ा से बचे रहते हैं। बड़े पर्दे की शान अपनी जगह, लेकिन जेब का विलाप भी कुछ कम नहीं होता। OTT पर देखना इसलिए पसंद है कि हिंसा, न्यूडिटी और अनावश्यक क्रूरता पर उँगली को फास्ट फॉरवर्ड का अधिकार रहता है। सच कहूँ तो मुझे अत्यधिक क्रूर दृश्य नहीं सुहाते—सिनेमा के नाम पर मांसपेशियां आज़माने की प्रतियोगिता मुझे नहीं भाती। खैर, पिक-ए-शो पर किसी तरह फिल्म पूरी की—क्योंकि जब फिल्म खुद अपने भीतर के असली हीरो-विलेन के लगाये जाने वाले कयासों के किबाद खोल दे और बाहर उसकी ऑटोप्सी चल रही हो, तो लिखना तो बनता ही है।
धुरंधर एक जासूसी थ्रिलर है—तेज़, शोरगुल वाली और आत्मविश्वास से लदी-पदी। फिल्म अपने राष्ट्रवादी तेवरों को छिपाती नहीं; बल्कि कई जगह उन्हें मंच ,माला और माइक पकड़वा देती है। कहानी एक भारतीय एजेंट के इर्द-गिर्द घूमती है, पृष्ठभूमि पाकिस्तान की है—और यहीं से फिल्म का तापमान सर पर चढ़ता है। आतंकवाद, जाली नोट, स्लीपर सेल, साज़िशें—सब कुछ इतना पैक्ड कि सांस लेने की जगह कम पड़ती है। संपादन कसा हुआ होता तो यह तेज़ी और असरदार बन सकती थी; कहीं-कहीं लगता है कि फिल्म अपनी ही मांसपेशियाँ दिखाने में देर लगा रही है।
रणवीर सिंह पूरी फिल्म को अपने कंधों पर उठाए चलते हैं। उनकी ऊर्जा, उनकी आँखों का उन्माद और संवाद अदायगी—सब मिलकर एक ऐसा किरदार रचते हैं जो आपको बाँधता भी है और कभी कभार थकाता भी। थकाता इसलिए कि हर दृश्य में अलर्ट और ऑन रहना आसान नहीं, और दर्शक भी आखिर इंसान है। संजय दत्त का किरदार खुरदरा और डरावना है, पर कुछ संवाद ऐसे हैं जहाँ गालियों की मात्रा कहानी से ज़्यादा मुखर हो रही है। गालियाँ सिनेमा में नई नहीं, पर जब वे चरित्र को हाई- जैक करने लगें, तो सवाल उठते हैं।
अक्षय खन्ना अपनी शांत, नियंत्रित उपस्थिति से फिल्म को संतुलन देते हैं। उनकी मौजूदगी बताती है कि अभिनय में शोर ज़रूरी नहीं—ठहराव भी काम करता है। राकेश बेदी अपने दमदार किरदार जो उनकी हास्य अभिनेता कि छवि से इतर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं l कई और सहायक भूमिकाएँ ठीक हैं, पर कई बार लगता है कि भीड़ ज़्यादा है, चेहरे कम याद रहते हैं। फिल्म का पहला हिस्सा अपेक्षाकृत खिंचा हुआ है; इंटरवल आते-आते यह अहसास होने लगता है कि कहानी अपनी ही रफ्तार से जूझ रही है। दूसरा हिस्सा पकड़ बनाता है, पर तब तक दर्शक थोड़ा थक चुका होता है।
तकनीकी पक्ष मजबूत है—बैकग्राउंड स्कोर आपको सीट से बाँधे रखता है, सिनेमैटोग्राफी चमकदार है, लोकेशन्स प्रभावशाली हैं। लेकिन यही चमक कभी-कभी कहानी पर भारी पड़ जाती है। धुरंधर अपने राष्ट्रवाद को पोस्टर की तरह दिखाती है—सीधे, सपाट और थोडा शोर के साथ । सूक्ष्मता की गुंजाइश थी, पर फिल्म ने लाउडस्पीकर चुना।
फिल्म का अंत अगली कड़ी का इशारा करता है—और शायद यही आज के सिनेमा की स्थायी योजना है: कहानी से ज़्यादा फ्रैंचाइज़ी। दर्शक निकलते हुए यही सोचता है कि देख लिया, चर्चा कर ली—अब यूट्यूब डिबेट्स देखना बाकी है।
कुल मिलाकर, धुरंधर एक ऐसी फिल्म है जो आपको बातचीत का हिस्सा बना देती है। यह महान सिनेमा नहीं, लेकिन समकालीन शोर का सटीक दस्तावेज़ ज़रूर है। अगर आप तेज़ थ्रिलर, राष्ट्रवादी टोन और स्टार-परफॉर्मेंस के शौकीन हैं, तो यह आपको निराश नहीं करेगी। और अगर आप मेरी तरह हैं—तो OTT का इंतज़ार करिए, फास्ट फॉरवर्ड का अधिकार अपने पास रखिए, और फिर आराम से तय कीजिए कि शोर में सिनेमा कितना है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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