भूमिका के बहुरुपिये
जहाँ तक भूमिका-लेखन की बात आती है, भूमिका वह बच्चा है जो लेखक की आत्मा के सबसे चरित्रहीन, सबसे धूसर कोने से जन्म लेता है। लेखक चाहे लाख दावा करे कि सृजन कर्म एक पवित्र अनुष्ठान है, लेकिन भूमिका की पवित्रता पर संदेह करने की छूट समाज, पाठक और स्वयं लेखक—तीनों को मिल ही जाती है। दरअसल भूमिका वही जगह है जहाँ लेखक का ग्रे साइड पूरे आत्मविश्वास के साथ उजागर होता है और वह बिना लज्जा स्वीकार करता है कि आगे जो आने वाला है, उसके लिए पहले से क्षमा-याचना ज़रूरी है।
पुस्तक चाहे जितनी खराब हो, भूमिका में कुछ दार्शनिक-सा, टटपुँजिया-सा लिख देने से यह उम्मीद पाल ली जाती है कि पाठक का गुस्सा थोड़ा ठंडा हो जाएगा। यह वही तकनीक है जो सरकारी विभाग हर आदेश पर “जनहित में जारी” लिखकर अपनाते हैं। जनहित हो या न हो, जारी होना ज़रूरी है—ठीक वैसे ही जैसे पुस्तक अच्छी हो या न हो, पुस्तक का उत्पादन होना चाहिए ।
कहा जाता है कि किसी भी किताब की सबसे समझदार चीज़ उसकी भूमिका होती है, क्योंकि वही एकमात्र स्थान है जहाँ लेखक अपनी गलती मानने को तैयार दिखता है—या कम से कम गलती मान लेने का अभिनय पूरे मनोयोग से करता है। भूमिका वह मंच है जहाँ लेखक पाठक के सामने हाथ जोड़कर खड़ा होता है और कहता है—“अगर किताब अच्छी लगे तो श्रेय मेरे खाते में डालिए, और अगर खराब लगे तो परिस्थितियाँ, स्वास्थ्य, समय की कमी और पाठकों की नासमझी ज़िम्मेदार हैं।” इस अर्थ में भूमिका एक साहित्यिक बीमा पॉलिसी है—डूबती किताब के लिए तिनके का सहारा।
जो लेखक भूमिका में विद्वत्ता का पिटारा खोलते हैं, प्रायः वही होते हैं जो कथा-वस्तु को भाषा के गरम मसालों, बिंबों और अलंकारों के घी में डुबोकर ऐसी खिचड़ी पकाते हैं कि पाठक न निगल पाता है, न उगल पाता है। उनकी रचनाएँ पेट में गैस और मस्तिष्क में धुंध पैदा करती हैं, लेकिन भूमिका पढ़कर ऐसा लगता है मानो साहित्य-जगत का कोई गायक-सम्राट तान लगाने से पहले गला साफ कर रहा हो।
कुछ लेखक भूमिका को हल्का-फुल्का रखते हैं और पुस्तक में गंभीरता का पहाड़ गिरा देते हैं। वे भूमिका में मीठी बातें कहकर पाठक को जाल में फँसाते हैं और भीतर दर्शन की ईंटें सिर पर दे मारते हैं। इसके उलट, जो भूमिका में गम्भीर मुद्रा धारण करते हैं, वे पुस्तक में ऐसे हास्य-कलाबाज़ निकलते हैं कि पाठक समझ ही नहीं पाता कि लेखक ने कब खूंटा तोड़ दिया और कब खुला सांड बन गया।
कुछ लेखक उद्देश्य के नाम पर भूमिका लिखते हैं, जबकि उनका उद्देश्य उनसे भी छुपा रहता है। वे रचना के पीछे उद्देश्य खोजते-खोजते इतने उलझ जाते हैं कि अंततः भूमिका का उद्देश्य ही पूरी किताब पर भारी पड़ जाता है। कई लेखकों के लिए यह एक तरह का पोस्ट-रिटायरमेंट प्लान भी है—जो स्वयं लिखना छोड़ चुके हैं या छुड़ा दिए गए हैं, वे अब दूसरों की पुस्तकों की भूमिकाएँ लिखकर सक्रिय बने रहते हैं।
ये भूमिका-विशेषज्ञ बरसात में उगी हरियल बेल की तरह होते हैं—अपने दम पर फल न दें, लेकिन दूसरे पेड़ों पर चढ़कर खूब फैल जाएँ। वे भूमिका में ही इतनी लंबी-चौड़ी चर्चाएँ छेड़ देते हैं कि बाद में यह कहकर बच निकलते हैं—“मेरा उद्देश्य लेखक की दृष्टि को विस्तृत करना था।” पाठक सोचता है—दृष्टि तो विस्तृत हुई, पर जेब सिकुड़ गई।
लेखक भूमिका में सबसे अधिक ईमानदार इसीलिए होता है क्योंकि बाकी पुस्तक में उसे ज्ञान के गुरुत्व-भार से झुककर चलना पड़ता है। भूमिका में वह खुलकर स्वीकार करता है कि यह उसकी पहली कोशिश है, अंतिम उम्मीद है, पारिवारिक दबाव का परिणाम है या किसी कमजोर क्षण में लिया गया फैसला। मतलब साफ़ है—अब भुगतो।
कुछ लेखक भूमिका लिखते समय इतने आत्मीय हो जाते हैं कि अपनी ही पुस्तक का मूल्यांकन ऐसे करते हैं जैसे माँ अपने कमजोर बच्चे का करती है—कमी को भी गुण में बदलकर। वे पुस्तक को पाठक की गोद में एक नवजात की तरह रख देते हैं, जिसे देखकर पाठक को “कितना प्यारा” कहना ही पड़ता है, चाहे भीतर से वह भागने का मन बना चुका हो।
और फिर आते हैं वे लेखक जो भूमिका में अपने आलोचकों को पहले ही चेतावनी दे देते हैं—“मेरी बातें असंगत हैं, पर आपको सुननी ही होंगी।” यह वही वर्ग है जिसने गांधीवादी धैर्य, जैन अहिंसा और शाकाहारी भाव मिलाकर ऐसा चरित्र गढ़ा है, जिसमें अहिंसा प्रचुर है, पर पाठक पर मानसिक प्रहार निरंतर जारी रहता है।
भूमिका का असली उद्देश्य किताब का परिचय देना नहीं, लेखक को निर्दोष साबित करना है। अगर भाषा भारी लगे तो वह लेखक की शैली है, और अगर हल्की लगे तो वह भी उसी की शैली। दोष किसी भी हालत में लेखक का नहीं, शैली का होता है। कुछ लेखक भूमिका को इतना विस्तार दे देते हैं कि पाठक को नींद लाने के लिए वही पर्याप्त हो जाती है—ताकि आगे पुस्तक के दोषों से वह सुरक्षित रह सके।
अंततः पाठक ही साहित्य-संसार का देवता है, जो भूमिका पढ़कर भी यह तय नहीं कर पाता कि लेखक से प्रेम करे, दया रखे या संशय। इसी दुविधा में वह पन्ने पलटता जाता है… और भूमिका अपनी भूमिका निभाकर चुपचाप किनारे बैठ जाती है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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