नया साल : तारीख नहीं, दृष्टि का उत्सव

नया साल : तारीख नहीं, दृष्टि का उत्सव

हममें से लगभग सभी ने न जाने कितनी बार कहा है—“हैप्पी न्यू ईयर!” सच कहूँ तो आज तक यह ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया कि जिनसे कहा गया, उनका साल सचमुच हैप्पी हुआ भी या नहीं। हाँ, एक बात तय है—जिस क्षण कोई आपको यह कहता है, वह एक मिनट ज़रूर कुछ हल्का, कुछ नरम, कुछ उम्मीद-सा हो जाता है। वही एक मिनट शायद सचमुच हैप्पी होता है।

इसीलिए सवाल यह नहीं है कि आप नया साल चैत्र प्रतिपदा को मानते हैं या पहली जनवरी को। सवाल यह है कि उस तारीख़ पर आप अपने भीतर कुछ नया जोड़ पाए या नहीं। अक्सर बड़े विश्वास से कहा जाता है कि नया साल तो चैत्र में आता है, बसंत में आता है। यह बात भारत के भूगोल, मौसम और सांस्कृतिक स्मृति के लिए बिल्कुल सही है। पर क्या वही चैत्र अंटार्कटिका में भी बसंत लाता है? क्या सहारा के रेगिस्तान में भी फूल खिलाता है? नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि चैत्र गलत है, इसका अर्थ केवल इतना है कि कोई भी नया साल सार्वभौमिक नहीं होता। हर नया साल स्थानीय होता है—मौसम की तरह, मनःस्थिति की तरह।

जिसे बर्फ़ गिरते देखना सुंदर लगता है, उसके लिए सफ़ेद धरती ही नवीनता है। जिसे पत्तों में हरियाली फूटते देखना भाता है, उसके लिए बसंत ही नया साल है। किसी के लिए हिजरी सन का आरंभ नया है, किसी के लिए रोमन कैलेंडर का पहला पन्ना। और सच तो यह है कि जिस ब्रह्मांड की आयु अरबों वर्षों की है, जिस पृथ्वी की जन्मतिथि हमें तक नहीं पता, उसके सामने हमारे सारे कैलेंडर दीवार पर टँगे छोटे-छोटे पर्चे भर हैं।

इसीलिए एक समय मुझे भी लगने लगा था कि मेरा असली नया साल मेरा जन्मदिन है। उस दिन से पहले न मैं ब्रह्मांड को जानता था, न ब्रह्मांड मुझे। मेरे लिए तो उसी दिन से सब कुछ शुरू हुआ। पर इससे भी आगे की बात यह है कि अगर आपका जन्मदिन इस साल नहीं आया, तो समझ लीजिए—आपका नया साल भी नहीं आया।

उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है। उत्सव मनाने का कोई भी अवसर क्यों छोड़ा जाए? अगर वह कला-विहीन नहीं है, अगर वह किसी को चोट नहीं पहुँचाता, तो उसे मनाने में हर्ज़ क्या है? मगर समस्या उत्सव नहीं है, समस्या है उत्सव का तरीका। आज नया साल हो, होली हो, दीपावली हो या शादी-ब्याह—लगभग हर जगह उत्सव का अर्थ शराब की बोतल, ताश की गड्डी और “होश से बाहर” होना मान लिया गया है। ये परंपराएँ न सनातन हैं, न शाश्वत। ये तो पिछले कुछ दशकों में बड़ी तेज़ी से विकसित हुई हैं। भारत में कभी दीपावली पर शराब पीने की कोई परंपरा नहीं थी। आज “उत्कृष्ट” कहलाने वाले लोग इसे स्टेटस सिंबल बना चुके हैं।

सवाल यह नहीं कि शराब पर रोक है या नहीं। सवाल यह है कि क्या नया साल मनाने के लिए नशा ज़रूरी है? अगर साल के पहले ही दिन आप बेहोश हैं, तो साल भर आपसे होश की क्या उम्मीद की जाए?

असल में नया साल तभी आता है जब आप अपनी किसी सड़ी हुई परंपरा से अपने जीवन का एक पैर बाहर निकालते हैं। अगर हर साल वही आदतें, वही गालियाँ, वही नशे और वही कुंठाएँ लेकर आप आगे बढ़ते हैं, तो आपकी हालत उस कैलेंडर जैसी है जो हर साल उसी खूंटी पर टँगा रहता है—बस तारीख़ बदल जाती है। नया साल तब है जब आप किसी एक बुरी लत को छोड़ते हैं, किसी एक विषाक्त स्मृति से दूरी बनाते हैं और अपने भीतर जमा बोझ में से कुछ फेंकते हैं।

अच्छी लतें मत छोड़िए। अगर संगीत की लत है, कविता की लत है, प्रकृति देखने की लत है—उन्हें सँभालकर रखिए। पर जो लत आपको भीतर से खोखला कर रही है, उससे बाहर निकलिए। वही नया साल है।

जैन दर्शन एक बहुत सुंदर रूपक देता है। वह कहता है कि हर व्यक्ति अपनी पीठ पर एक टोकरी लटकाए चलता है। रास्ते में जो भी अनुभव मिलता है—दुख, सुख, सफलता, प्रशंसा—हम उसे उठाकर उस टोकरी में डाल लेते हैं। विवेकवान व्यक्ति अनुभव को देखता है, समझता है और वहीं छोड़कर आगे बढ़ जाता है। अविवेकी व्यक्ति सोचता है—“क्या पता, यह कोहिनूर हो!” और उसे टोकरी में डाल लेता है। परिग्रह एक आदत है, और हर आदत रोग बन सकती है। शरीर में कोशिकाएँ ज़्यादा हो जाएँ तो कैंसर, दिमाग में स्मृतियाँ ज़्यादा भर जाएँ तो पागलपन, लोग ज़्यादा इकट्ठा हो जाएँ तो भीड़, और भीड़ ज़्यादा उग्र हो जाए तो मॉब।

हम दुखों से नहीं टूटते, हम सुखों की स्मृतियों से टूटते हैं। किसी की मृत्यु हमें नहीं रुलाती, उससे जुड़े हमारे सुख रुलाते हैं। तालियों को टोकरी में रख लिया, तो अगली बार अगर तालियाँ नहीं मिलीं, वही तालियाँ आपको गालियों की तरह चुभेंगी।

इस संसार में कोई भी वस्तु स्थायी रूप से सुंदर नहीं रहती। फूल भी मुरझाते हैं, तितलियाँ भी उड़ जाती हैं। सुंदर वही है जो नया है, और नया वही है जो छूटा हुआ है। बगीचे में फूल देखिए, पर उन्हें तोड़कर घर मत ले आइए। खुशबू में ठहरिए, पर उसी में बस मत जाइए। जीवन के अनुभव भी ऐसे ही हैं—देखिए, समझिए और आगे बढ़ जाइए।

अंततः नया साल तब नहीं आता जब कैलेंडर बदलता है। नया साल तब आता है जब दृष्टि बदलती है—जब आप अपने भीतर जमा संदूक खोलते हैं और उसमें भरी फालतू चीज़ें बाहर फेंकते हैं। जिस दिन आप किसी पुराने डर, किसी मृत रिश्ते या किसी ज़हरीली स्मृति से बाहर कदम रखते हैं, उसी दिन—चाहे चैत्र हो, चाहे जनवरी हो, चाहे आपका जन्मदिन—वही आपका सच्चा नया साल है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

No comments yet

Be the first to share your thoughts!