जब लाइट चली गई… और ज़िंदगी फिर भी जलती रही

जब लाइट चली गई… और ज़िंदगी फिर भी जलती रही

“जब लाइट चली गई…”
यह वाक्य सुनकर आप चौंक गए होंगे। आज के इन्वर्टर–पावर बैंक–मोबाइल के युग में भला लाइट जाना कोई ऐसी घटना है, जिस पर लिखा जाए?
लेकिन ज़रा रुकिए—याद कीजिए बचपन।

बचपन में लाइट जाना कोई साधारण तकनीकी समस्या नहीं होती थी, वह पूरे मोहल्ले का ब्लैकआउट महोत्सव हुआ करता था। लाइट जाते ही एक आवाज़ गूंजती—
आपने ध्यान दिया होगा , पूरे मोहल्ले से एक संयुक्त स्वर—
“अरे… चली गई!”
और लाइट आते ही दूसरा सामूहिक उद्घोष—
“आ गई… आ गई!” इस माया की तरह बिजली का अना जाना लगा रहता था ।

हमारे लिए लाइट जाना मतलब—पढ़ाई से छुट्टी।
 बशर्ते की एग्जाम आपके सर पर नहीं नाच रही हो ,या छुट्टियों का दिया होमवर्क जो आपको  छुट्टी के आखिरी दिन में पूरा करना है ,तब तो आपको लैंप या कैंडल लाइट होम वर्क या मिटटी के तेल की ढिबरी में अपनी आँखें फोड़ना आपकी मजबूरी हो जाती थी ।!
शाम को लाइट जाते ही घर का नक्शा बदल जाता।छत पर चढ़ना अनिवार्य कार्यक्रम होता।
तारों को टिमटिमाते देखना,दादी  की डरावनी कहानियाँ,
चिड़िया–चिड़े की किस्सागोई,भाई–बहनों की खींचतान,
शिकायतें, झगड़े, हँसी, धमाचौकड़ी—सब कुछ मुफ्त में, बिना किसी सब्सक्रिप्शन के।

और सच कहूँ—
उस समय लाइट का आ जाना हमें रात में स्कूल के मास्टर जी के घर आ जाने जैसा डरावना लगता था।
खासतौर पर रात की बात कर रहा हूँ—
अभी कहानी अपने चरम पर है,
और तभी—ट्र्र्र…लाइट आ गई।कहानी अधूरी, मासूम सपने बिखरे।

फिर आया इन्वर्टर
उसने लाइट जाने और आने के बीच की पूरी संवेदना ही खत्म कर दी।अब पता ही नहीं चलता था कि बिजली गई या आई।बच्चों के लिए यह एक नई मुसीबत बन गयी
लाइट आये या न आये ,छुटके का  होमवर्क चालू है ,मम्मी रसोई में पका रही है ,
पापा रिमोट से चिपके  हुए हैं यथावत जैसे रिमोट कोई पुश्तैनी संपत्ति हो।
परिवार में वह समय—जब दिनभर की थकान के बाद सब एक साथ बैठते थे—
धीरे-धीरे इतिहास बन गया।

फिर आया मोबाइल।अब लाइट और इन्वर्टर दोनों अप्रासंगिक हो गए।
बिजली जाए या आए—जीवन चलता रहता है।

और अब ज़रा इस दृश्य पर आइए—
एक दिन ऐसी ज़बरदस्त ग्रिड फेल हुई कि बारह घंटे तक लाइट नहीं आई।
इन्वर्टर भी दो घंटे में हाँफ गया, लेकिन अब लाइट की जरोरोअत बस इत्तू सी की मोबाइल चार्ज हो जाए बस l
घरवालों ने तुरंत सारे पंखे, लाइट, उपकरण बंद कर दिए।
सिर्फ़ एक पॉइंट चालू रखा—मोबाइल चार्ज करने के लिए।

और लीजिए—बारह घंटे की लाइट कटौती भी अब कोई घटना नहीं रही।
ज़िंदगी बदस्तूर चल रही थी—स्क्रीन के सहारे।
न तारे देखने की ज़रूरत,न कहानी सुनने की,न आपस में बात करने की।

बस मोबाइल है, चार्ज है—
तो अंधेरा भी रोशन है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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