नया साल : कैलेंडर नहीं, चेतना का उत्सव

नया साल आते ही हम अचानक कुछ ज़्यादा ही उत्साहित क्यों हो जाते हैं?
कैलेंडर की एक तारीख़ बदलती है, दीवार पर टँगा अंक उलटता है, और हमारे भीतर कोई अदृश्य स्विच ऑन हो जाता है—अब कुछ नया करना है। यह अजीब-सा चमत्कार है कि समय वही रहता है, धड़कनें वही, साँसें वही—बस हमारे मन का “री-स्टार्ट” बटन दब जाता है। दिलचस्प यह है कि नया साल नया इसलिए नहीं होता कि समय बदल गया, बल्कि इसलिए कि हम बदलने की उम्मीद करने लगते हैं—और उम्मीद ही मनुष्य की सबसे पुरानी नई चीज़ है।

शायद इंसान की सबसे बड़ी खासियत यही है कि वह हर पल अपने आप को अपडेट करने की संभावना में जीता है। वह सिर्फ़ साँस नहीं लेता—वह साँसों के साथ विचार भी लेता–छोड़ता है। वह बीते कल को सिर्फ़ स्मृति की अलमारी में नहीं रखता, उसे सीख की फाइल बनाकर आगे की टेबल पर भी रख देता है। नए साल का उत्साह दरअसल उसी आंतरिक क्षमता का उत्सव है, जिसमें आदमी अपने भीतर ही अपने आप से कहता है—“जो था, वह संदर्भ बनेगा; जो होगा, वह प्रयोग।” और प्रयोग का आनंद, चाहे सफल हो या असफल, जीवन को चलायमान बनाए रखता है।

हर नया साल पुराने साल को मिटाता नहीं, उसे तुलना के लिए बचा कर रखता है। पुराना साल हमारे लिए एक दर्पण होता है—जिसमें हम अपनी सफलताओं को तौलते हैं, अपनी विफलताओं से आँख मिलाते हैं, और तय करते हैं कि इस बार वही गति नहीं दोहरानी है, इस बार दिशा बदलनी है। असल में हम किसी तारीख़ से नहीं बदलते, हम अपने भीतर एक “वाक्य” से बदलते हैं—कभी संकल्प के रूप में, कभी पश्चाताप के रूप में, कभी नए सपने के रूप में। नया साल उसी वाक्य का सार्वजनिक उच्चारण है—भले ही वह वाक्य अक्सर फरवरी आते-आते बुदबुदाहट में बदल जाए।

यही वह बिंदु है जहाँ इंसान और प्रकृति के बीच एक महीन-सा फर्क उभरता है। प्रकृति में नया साल नहीं आता। शेर आज भी वैसे ही शिकार करता है जैसे वह सदियों से करता आया है। बादल, बिजली, हवा, पानी—आज भी वही हैं, वही ढंग, वही लय। प्रकृति में बदलाव है, पर नवीनता का उत्सव नहीं। वहाँ निरंतरता है, संकल्प नहीं। जंगल में कैलेंडर नहीं होता, सिर्फ़ मौसम होता है। पेड़ों के लिए जनवरी की कोई भावुकता नहीं, उनके लिए बस धूप की मात्रा बदलती है। नदी के लिए “पिछला साल” कोई अध्याय नहीं, उसके लिए बस बहाव है। सूरज के लिए “नई शुरुआत” कोई भाषण नहीं, उसके लिए बस उगना है।

जानवरों के लिए “पुराना” और “नया” कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं है। उनकी आदतें स्मृति से नहीं, प्रवृत्ति से चलती हैं। वे बदलते हैं, पर बदलने का संकल्प नहीं लेते—वे अनुकूलित होते हैं। भूख बढ़े तो रास्ता बदल लेते हैं, खतरा बढ़े तो झुंड में सिमट जाते हैं, मौसम बदले तो रंग और रोएँ बदल लेते हैं। लेकिन वे अपने आप से यह नहीं कहते—“इस बार मैं नया बनूँगा।” वे बस होते हैं, रहते हैं, चलते हैं। उन्हें आत्म-विश्लेषण की ज़रूरत नहीं, क्योंकि उन्हें आत्म-प्रदर्शन का शौक़ नहीं।

और मज़े की बात देखिए—इंसान ने उसी अनुकूलन की ताक़त को हथियार बना लिया। वही अनुकूलन, जो प्रकृति में जीवित रहने की कला था, मनुष्य में जीतने की महत्वाकांक्षा बन गया। आदमी ने गिद्ध की नज़र अपने भीतर बसा ली—अब वह अवसर को मरे हुए सच से भी सूँघ लेता है। शेर से भी ज़्यादा हिंसक हो गया—पर अपने पंजों पर दस्ताने पहन कर, ताकि खून दिखे नहीं और अपराधबोध भी न लगे। लोमड़ी जैसी चालाकी को उसने “रणनीति” नाम दे दिया, ताकि छल भी बुद्धिमत्ता लगे। बंदर की छलाँग को “मल्टीटास्किंग” कहकर सम्मानित कर दिया, ताकि अस्थिरता भी प्रतिभा लगे। हम दौड़ते हैं तो कहते हैं—मैं मेहनती हूँ, भागते हैं तो कहते हैं—मैं व्यस्त हूँ, छीनते हैं तो कहते हैं—मैं प्रतियोगी हूँ। हमने पशु-प्रवृत्तियों को अपनाया, लेकिन उन्हें नैतिक तर्कों से सजाकर।

यही कारण है कि इंसान आपदा को अवसर में बदलना सीख गया, प्रकृति पर अधिकार जमाने लगा, और धीरे-धीरे खुद को सबसे बुद्धिमान शिकारी मानने लगा। और जब वह खुद को सबसे बुद्धिमान मानता है, तो वह यह भी मान लेता है कि वह हर चीज़ को अपने हिसाब से परिभाषित कर सकता है—सफलता को भी, असफलता को भी, रिश्तों को भी, और समय को भी। नए साल का जश्न भी इसी परिभाषा का हिस्सा है—एक सामूहिक घोषणा कि “हम चाहें तो बदल सकते हैं।” यह अलग बात है कि हम बदलने का काम अक्सर अगले सोमवार पर टाल देते हैं, और सोमवार फिर किसी और सोमवार में बदलता रहता है।

फिर भी—हर नए साल पर वही इंसान एक पल को रुककर सोचता है—“क्या मैं यही रहना चाहता हूँ?” यह प्रश्न किसी पार्टी की आतिशबाज़ी से बड़ा है। यह प्रश्न किसी पोस्ट के हैशटैग से ज़्यादा वास्तविक है। यह प्रश्न किसी लक्ष्य-तालिका से ज़्यादा जीवित है। यही प्रश्न नए साल को खास बनाता है। न प्रकृति यह पूछती है, न जानवर। क्योंकि न प्रकृति को आत्म-सुधार की चिंता है, न जानवरों को आत्म-छवि की। लेकिन इंसान के भीतर एक विचित्र आग है—वह खुद से भी लड़ता है और खुद को भी बनाता है।

नया साल दरअसल कैलेंडर का नहीं, चेतना का उत्सव है। यह वह क्षण है जब इंसान अपनी ही बनाई आदतों से बाहर झाँकने की कोशिश करता है। वह अपनी दिनचर्या की दीवार में एक खिड़की खोलकर देखता है कि बाहर भी हवा है, और भीतर भी दम है। जब वह कहता है—मैं वही रह सकता हूँ जो था, पर मैं कुछ और भी बन सकता हूँ। यह “कुछ और” ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है—धर्म नहीं, संभावना। और शायद यही वजह है कि नया साल हमें रोमांचित करता है, क्योंकि वह हमें याद दिलाता है—हम केवल चलते हुए समय के यात्री नहीं हैं, हम उसके सह-निर्माता भी हैं।

और सच तो यह है कि नया साल एक तारीख़ नहीं, एक प्रस्ताव है—जिसे हर कोई स्वीकार करता है, कोई-कोई निभाता है, और कई लोग फिर अगले साल उसी प्रस्ताव को “री-न्यू” कर देते हैं। लेकिन फिर भी अच्छा है—क्योंकि इंसान अगर उम्मीद का वार्षिक संस्करण भी डाउनलोड करता रहे, तो भी वह जानवरों से अलग ही रहेगा।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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