हवाओं से जंग और अज़्म की जीत

एक

इन हवाओं से कई बार मेरी जंग रही।

इन हवाओं ने कई बार गुज़रने न दिया।

तेज़ लहरों से उलझता रहा, लड़ता ही रहा।

बस मेरा अज़्म* था जिसने मुझे मरने न दिया।।

* दो

खाने को दौड़ते हैं ये दीवारो-दर मुझे।

सेहरा* का नक़्शा लगने लगा अपना घर मुझे।

दिल से तेरा ख़याल भी जाता रहा है अब।

बारे-ग़मे- हयात* मिला इस क़दर मुझे।।

* तीन

दिलों से बुग़्ज़ो-कुदूरत* निकाल कर यारो।

सफ़ीना* बहरे-वफ़ा में उतार कर देखो।

जहाँ को एक नई तर्ज़े ज़िंदगी* देकर।

निज़ामे-गुलशने-हस्ती* सॅंवार कर देखो।।

* शकूर अनवर

अज्महौसला सेहरारेगिस्तान बारे-ग़मे-हयातजीवन की पीड़ाओं का बोझ बुग्ज़ो-कुदूरतद्वेष और ईर्ष्या सफ़ीनाबेड़ा तर्ज़े ज़िंदगीजीवन शैली निज़ामे-गुलशने-हस्ती*जीवन रूपी उपवन की व्यवस्था

Shakoor Anvar

Content Writer at Baat Apne Desh Ki

Shakoor Anvar is a passionate writer who shares insights and knowledge about various topics on Baat Apne Desh Ki.

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