गंगापुर सिटी।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, गंगापुर शाखा के तत्वावधान में कल गुलकन्दी आदर्श विद्या मंदिर के सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार श्री हनुमान मुक्त की अध्यक्षता में एक साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में परिषद् से जुड़े साहित्यप्रेमियों, कवियों, पाठकों एवं साहित्य-साधकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। संगोष्ठी का वातावरण साहित्यिक ऊष्मा, वैचारिक संवाद और आत्मीयता से परिपूर्ण रहा।
कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्वलन एवं श्री कृपाशंकर उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना के सुमधुर एवं संगीतबद्ध स्वर के साथ हुआ। प्रारम्भ में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए श्री हनुमान मुक्त ने कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा परिषद् की आगामी गतिविधियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 30 एवं 31 मई को कोटा में अखिल भारतीय साहित्य परिषद् का प्रांतीय अधिवेशन आयोजित होने जा रहा है, जिसमें गंगापुर सिटी शाखा की ओर से सहभागिता हेतु डॉ. मुकेश गर्ग एवं अजय विद्रोही को नामित किया गया है।
उन्होंने परिषद् की गतिविधियों को अधिक व्यापक बनाने पर बल देते हुए कहा कि ऐसे साहित्यप्रेमियों को परिषद् से जोड़ा जाना चाहिए जिन्हें साहित्य लेखन, पठन एवं वैचारिक गतिविधियों में रुचि हो। इस दिशा में सभी सदस्यों से सक्रिय सहयोग का आग्रह भी किया गया।
संगोष्ठी में श्रीधर पराड़कर द्वारा लिखित चर्चित उपन्यास ‘तत्वमसि’ पर विशेष चर्चा आयोजित की गई, जिसकी समीक्षात्मक प्रस्तुति डॉ. मुकेश गर्ग ने दी। उन्होंने कहा कि यह उपन्यास केवल एक कथा नहीं, बल्कि पूर्णकालिक प्रचारक एवं कार्यकर्ता जीवन का जीवंत दस्तावेज है। उपन्यास में संघ कार्यकर्ताओं के जीवन-व्रत, उनके कार्य करने की शैली तथा समाज में प्रचलित अनेक भ्रांतियों का अत्यंत रोचक एवं कथात्मक ढंग से निराकरण किया गया है।
डॉ. गर्ग ने कहा कि ‘तत्वमसि’ मानव के आदि काल से चले आ रहे उस मूल प्रश्न — “मैं कौन हूँ और इस धरती पर मेरा क्या प्रयोजन है?” — का एक सार्थक और चिंतनपरक उत्तर प्रस्तुत करता है। उपन्यास यह संदेश देता है कि कर्म और नियति के संतुलन के साथ गृहस्थ जीवन जीते हुए भी व्यक्ति समाज एवं राष्ट्र कल्याण के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यह कृति आत्मावलोकन, सेवा, राष्ट्रवाद और सामाजिक सरोकारों से युक्त सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा देती है तथा पाठक को बिना बोझिल किए गहन चिंतन की ओर ले जाती है।
कार्यक्रम में श्री व्यंग्य पांडेय ने “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि व्यक्ति के भीतर आत्मज्ञान और स्वचेतना का जागरण होना आवश्यक है। जब व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है, तभी उसके भीतर विश्वबोध की चेतना विकसित होती है। उन्होंने कहा कि विश्व कल्याण के लिए कार्य करने वाले सभी महापुरुष पहले आत्मबोध की प्रक्रिया से गुजरे। वर्तमान समय में उपभोक्तावादी संस्कृति, युद्ध, वैमनस्य और पाखंड जैसी प्रवृत्तियों से मुक्ति पाने के लिए आत्मबोध एवं प्रकृति के साथ सामंजस्य आवश्यक है।
संगोष्ठी में श्री कृपाशंकर उपाध्याय ‘प्रीतम ‘,बनवारी श्याम गौतम एवं श्री सतीश कुलचनिया ने भी ‘आनंद मठ’ उपन्यास तथा “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने साहित्य को समाज में वैचारिक जागृति एवं सांस्कृतिक चेतना का सशक्त माध्यम बताया।
अंत में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने नियमित साहित्यिक गतिविधियों के आयोजन एवं युवा पीढ़ी को साहित्य से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम आत्मीय संवाद एवं साहित्यिक विमर्श के साथ सम्पन्न हुआ।
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