पंचतत्व पैकेज : आत्मा की शिकायत पेटी से
ऊपर से दृश्य बड़ा साफ़ दिखाई देता है। अस्पताल की जर्जर छत के दरारों में झाँककर मैं सब कुछ देख पा रहा हूँ। नीचे आपातकालीन वार्ड है—वहाँ आपातकाल जैसी नहीं, बल्कि स्थायी अफ़रा-तफ़री मची हुई है। इधर-उधर दौड़ते कर्मचारी, मशीनों पर साँसें गिरवी रखे मरीज़, और कुछ कर्मचारी ऐसे मरीज़ों को खींचते-घसीटते ले जा रहे हैं जैसे किसी सरकारी दफ़्तर में रेड पड़ने पर गोपनीय फ़ाइलें ठिकाने लगाई जाती हैं। कहीं पाइप से पानी टपक रहा है, कहीं दीवारों पर आग की पुरानी राख अब भी ऐसे झाँक रही है, मानो याद दिला रही हो—“मैं गई नहीं हूँ, बस रूप बदल लिया है।”
हाँ, उसी राख के ढेर को छानकर निकली हूँ मैं—मेरी आत्मा। संभव है, मेरे अग्नि-आहुति में समर्पित शरीर का कोई अंश अब भी इसी राख में चिपका हो। ऊपर से सब झाँककर देख रही हूँ। कोई स्टिंग ऑपरेशन वाला पत्रकार नहीं हूँ मैं, न ही कोई विरोधी दल का नेता कि शोर मचा सकूँ। मैं तो बस उन आत्माओं में से एक हूँ, जो कुछ महीने पहले अस्पताल की “अग्नि-योजना” के अंतर्गत पंचतत्व में विलीन कर दी गई थी। आत्मा हूँ, इसलिए आवाज़ नहीं, सिर्फ़ दृष्टि बची है। और मन में एक हल्की-सी ठगी का भाव—कि यार, मरने से पहले कोई विकल्प तो दिया जाता।
मतलब मरना तो तय था, यह बात हम मान चुके थे। लेकिन किस तत्व से मरना है—यह अधिकार भी हमने प्रशासन के चरणों में समर्पित कर दिया। पहले आग, अब पानी। लगता है अस्पताल पंचतत्व को सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है। कोई अद्भुत प्रयोग चल रहा है, मित्र—“पहले अग्नि, आज जल, कुछ महीनों बाद वायु, फिर पृथ्वी, और अंत में आकाश।” ज़रा धैर्य रखिए, एक-एक तत्व का इंतज़ाम करने में समय लगता है। आप क्या समझते हैं, तत्व ऐसे ही तैयार हो जाते हैं? ठेकेदारों की मिलीभगत, कमीशनखोरी, हरामखोरी और ढिठाई की सांगठगांठ के बाद ही तय होता है कि अगली सामूहिक आहुति किस तत्व में दी जाएगी।
आग भी ऐसे ही थोड़ी भड़की थी। महीनों की लापरवाही का नतीजा था—जंग लगे तार, जिन्हें बदला नहीं गया, तभी जाकर कहीं शॉर्ट सर्किट को अवसर मिला। अब पानी भी ऐसे ही नहीं भर जाएगा। पाइपों को जंग लगे हाथों में छोड़ना पड़ता है, निकासी के मुँह बंद करने होते हैं, यह देखा जाता है कि अधिकतम मरीज़ वेंटिलेटर पर हों, ताकि जल-तत्व के तांडव से डरकर कोई भाग न सके।
हवा का इंतज़ाम तो और भी आसान है। उसके लिए तत्व का न होना ही पर्याप्त है। ज़्यादा मेहनत नहीं—बस खाली सिलेंडर रखे रहो, भरवाओ मत। लोग अपने-आप हवा की कमी से मर जाएँगे। और फिर हवा पर इल्ज़ाम लगाने का सवाल ही नहीं उठेगा। बिना मौजूद हुए भी कोई किसी की मौत का ज़िम्मेदार कैसे हो सकता है—बताइए!
पृथ्वी के लिए तो तैयारी पहले से ही पूरी है। दीवारें खंडहर बनी खड़ी हैं। बस हवा-पानी का थोड़ा अप्रत्यक्ष सहयोग चाहिए। छत से प्लास्टर झड़े या नींव हल्की-सी खिसक जाए—काफ़ी है। पहले से मरणासन्न मरीज़ को रथ का इतना झटका ही पर्याप्त होता है। और अगर इसी दौरान कहीं भूकंप का हल्का-सा संकेत मिल जाए, तो पृथ्वी-तत्व अपने आप सक्रिय हो जाएगा।
आकाश के लिए तो सबसे आसान प्रबंध है। छत टपकती-टपकती एक दिन सीधे गिर जाए। सीधा आकाश-तत्व से मिलन—मरीज़ की आत्मा मुक्त।
तो फिर कहना ही क्या। अस्पताल वालों की भी मजबूरी है। पंचतत्व को एक साथ साधने में ज़्यादा ऊर्जा लगती है, ज़्यादा तालमेल चाहिए। गठबंधन वैसे ही मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं। ऐसे में एक ही तत्व काफ़ी है—कम से कम सरप्राइज़ तो बना रहेगा। कौन-सा तत्व मिलेगा? अनुमान लगाइए। आँखें मूँदकर पड़े रहिए। कौन-सा आपके नसीब में है—यह प्रशासन के मूड, बजट और मौसम पर निर्भर करता है। पहला वाला भी हो सकता है, दूसरा भी। पहला फ़ाइलों में दबा पड़ा है, जाँच चल रही है, आने में समय लगेगा—आपको दूसरा मिल जाएगा।
वैसे आग वाले दिन गर्मी अच्छी-खासी थी। शरीर जल्दी जला और आत्मा फुर्ती से निकल भागी। यमदूत को भी ज़्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। पानी थोड़ा समय लेता है। पहले मरीज़ों के घर के बर्तन सूखते हैं। इतना पानी उन्होंने जीवन में देखा नहीं। एक साथ देखकर भौंचक्के खड़े रहते हैं, डूबने से पहले पानी को निहारते रहते हैं।
अस्पताल अगर चाहे तो पंचतत्व का पूरा समन्वय मॉडल बना सकता है। लेकिन लगता है अभी वे एलिमेंट-बाय-एलिमेंट ही काम कर रहे हैं। नीचे फिर हलचल है। पानी का भंडा अपने काम से पहले ही फूट गया। कोई बात नहीं। जब तक अस्पताल प्रशासन अगले तत्व की तैयारी में जुटता है, चिंता मत कीजिए—मैं ऊपर से देख रहा हूँ। जैसे ही कोई नई सूचना आएगी, शिकायत पेटी में दर्ज करा दूँगा।
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