भारत केवल एक भू-राजनीतिक इकाई नहीं है, वह एक जीवंत सभ्यता है—और किसी भी जीवंत सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति उसका युवा मन होता है। आज जब हम इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में खड़े हैं, तब भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। यह तथ्य केवल जनगणना का आँकड़ा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अवसर है। यह वही क्षण है जिसकी ओर संकेत करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि “डर को बाहर फेंक दो, उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।” उनके लिए युवा केवल उम्र का वर्ग नहीं था, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का इंजन था—साहसी, आकांक्षी और साफ़ दिल वाला।
राष्ट्र-निर्माण का अर्थ केवल पुल, सड़क, इमारतें या आँकड़ों में बढ़ता GDP नहीं होता। राष्ट्र-निर्माण का असली अर्थ है—मूल्यों का निर्माण, चरित्र का निर्माण और सामूहिक चेतना का निर्माण। जब युवा अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं रखते, बल्कि समाज और देश के साथ जोड़ते हैं, तभी राष्ट्र का वास्तविक विकास होता है। भारत की युवा शक्ति आज इसी संक्रमण काल से गुजर रही है—जहाँ “नौकरी पाने” की मानसिकता धीरे-धीरे “नौकरी देने” की सोच में बदल रही है।
स्वामी विवेकानंद का राष्ट्रवाद आक्रामक नहीं, बल्कि रचनात्मक था। वह आध्यात्मिक राष्ट्रवाद था, जिसमें सेवा ही साधना थी। “नर सेवा ही नारायण सेवा है”—यह वाक्य केवल धार्मिक उद्घोष नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन है। आज जब युवा स्टार्टअप, सामाजिक उद्यम, स्वयंसेवी संगठनों, नवाचार और सार्वजनिक नीति में आगे बढ़ रहे हैं, तो वे अनजाने ही उसी विवेकानंदीय परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। स्वस्थ शरीर, निर्भीक मन और सेवा-भाव—ये तीनों स्तंभ आज के युवा के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
राजनीति को लेकर भारत में लंबे समय तक एक नकारात्मक धारणा रही—कि राजनीति मतलब गंदगी, भ्रष्टाचार और परिवारवाद। इसका परिणाम यह हुआ कि ईमानदार, प्रतिभाशाली और संवेदनशील युवा राजनीति से दूर होते चले गए। लेकिन लोकतंत्र को ठीक करने के लिए “ठीक लोगों” का राजनीति में आना अनिवार्य है। जब युवा नीति-निर्माता बनते हैं, कानून-निर्माता बनते हैं और निर्णय-प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं, तभी लोकतंत्र जीवंत रहता है। आज युवाओं के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि राजनीति केवल सत्ता का खेल नहीं, बल्कि सार्वजनिक उत्तरदायित्व का सबसे बड़ा मंच है।

भारत के राष्ट्र-निर्माण में युवाओं की भूमिका शिक्षा से शुरू होती है। शिक्षा केवल डिग्री नहीं, बल्कि दृष्टि देती है। जब युवा अपने अतीत पर गर्व करना सीखते हैं, तो वे वर्तमान में आत्मविश्वास से खड़े होते हैं और भविष्य के लिए साहसिक निर्णय लेते हैं। विवेकानंद कहते थे कि जिस राष्ट्र को अपने अतीत पर गर्व नहीं, वह भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति, दर्शन और परंपराओं से जुड़ाव—युवाओं को संकीर्ण नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनाता है।
आज का युवा प्रतिस्पर्धा, असुरक्षा और तेज़ गति के दबाव से भी जूझ रहा है। कुछ पाने की बेचैनी और कुछ खो देने का डर—यह मानसिक द्वंद्व कई बार नकारात्मकता को जन्म देता है। ऐसे समय में भारत की आध्यात्मिक परंपरा एक संतुलन देती है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों का संतुलन ही भारतीय जीवन-दर्शन है। यह संतुलन युवाओं को सिखाता है कि करियर महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है सामाजिक दायित्व।
राष्ट्र-निर्माण का एक बड़ा पक्ष कौशल विकास और उद्यमिता है। जब युवा अपनी क्षमता को पहचानते हैं, नवाचार करते हैं और समस्याओं का समाधान खोजते हैं, तब वे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए अवसर पैदा करते हैं। भारत में कौशल आधारित अर्थव्यवस्था का उभार, स्टार्टअप संस्कृति और आत्मनिर्भरता का विचार—यह सब युवा ऊर्जा का ही परिणाम है। यही वह ऊर्जा है जिसे नज़रअंदाज़ करके कोई भी राष्ट्र आगे नहीं बढ़ सकता।
अंततः राष्ट्र-निर्माण का सार यही है कि युवा स्वयं को केवल उपभोक्ता न समझें, बल्कि निर्माता बनें—नीतियों के, विचारों के, संस्थाओं के और मूल्यों के। जब युवा यह समझ लेते हैं कि उनका प्रत्येक निर्णय देश की दिशा को प्रभावित करता है, तभी वे वास्तव में “राष्ट्र के भाग्य-विधाता” बनते हैं। यही वह भारत है, जिसकी नींव युवा शक्ति पर टिकी है।
Comments ( 0)
Join the conversation and share your thoughts
No comments yet
Be the first to share your thoughts!