इक्कीसवीं सदी में किसी भी राष्ट्र की वैश्विक पहचान केवल उसकी सैन्य शक्ति या आर्थिक आकार से तय नहीं होती, बल्कि उसकी मानव-पूंजी, विचार-शक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव से बनती है। इस संदर्भ में भारत की युवा शक्ति उसका सबसे बड़ा वैश्विक ब्रांड बनकर उभर रही है। आज दुनिया के शीर्ष तकनीकी संस्थानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, अनुसंधान केंद्रों और नीति मंचों पर भारतीय युवाओं की उपस्थिति केवल संयोग नहीं, बल्कि वर्षों की बौद्धिक और सांस्कृतिक तैयारी का परिणाम है।
कभी “ब्रेन ड्रेन” की चिंता भारत के नीति-विमर्श का बड़ा विषय थी। प्रतिभाशाली युवा विदेश जाते थे और देश पीछे छूट जाता था। लेकिन आज परिदृश्य बदल रहा है। अब यह “ब्रेन सर्कुलेशन” का दौर है—जहाँ भारतीय युवा वैश्विक अनुभव लेकर वापस लौट रहे हैं, भारत में निवेश कर रहे हैं, स्टार्टअप खड़े कर रहे हैं और ज्ञान को स्थानीय संदर्भों में लागू कर रहे हैं। यह बदलाव भारत की वैश्विक छवि को एक उपभोक्ता बाज़ार से आगे ले जाकर “वैश्विक समाधानकर्ता” के रूप में स्थापित कर रहा है।

भारत की युवा शक्ति की सबसे बड़ी विशेषता है—उसकी अनुकूलन क्षमता। भारतीय युवा पश्चिमी विज्ञान और तकनीक को अपनाते हैं, लेकिन अपनी सांस्कृतिक जड़ों को नहीं छोड़ते। यही कारण है कि भारत की “सॉफ्ट पावर” लगातार बढ़ रही है—योग, आयुर्वेद, ध्यान, भारतीय दर्शन, सिनेमा, साहित्य और डिजिटल नवाचार—इन सबके पीछे युवा नेतृत्व है। जब दुनिया तनाव, अवसाद और असंतुलन से जूझ रही है, तब भारत का आध्यात्मिक दृष्टिकोण एक वैकल्पिक राह दिखाता है।
वैश्विक मंच पर भारत की पहचान केवल आईटी या इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रही। आज भारतीय युवा नीति-निर्माण, जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मानवाधिकार जैसे विषयों पर भी नेतृत्व कर रहे हैं। यह उस आत्मविश्वास का संकेत है, जो अपने अतीत से जुड़कर भविष्य की दिशा तय करता है। स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में जब भारत की बात रखी थी, तो वह केवल एक भाषण नहीं था—वह भारत की आत्मा का वैश्विक परिचय था। आज वही परिचय लाखों युवाओं के कार्यों में प्रतिध्वनित हो रहा है।
भारत की वैश्विक पहचान में प्रवासी भारतीय युवाओं की भूमिका भी निर्णायक है। वे सेतु हैं—भारत और दुनिया के बीच। वे अपने कार्य से यह साबित कर रहे हैं कि भारतीयता किसी भूगोल की मोहताज नहीं, बल्कि एक मूल्य-व्यवस्था है। यह मूल्य-व्यवस्था ईमानदारी, परिश्रम, सहिष्णुता और सेवा पर आधारित है। जब कोई भारतीय युवा वैश्विक मंच पर सफल होता है, तो वह केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक आत्मविश्वास को मजबूत करता है।

डिजिटल युग में भारत की युवा शक्ति ने एक और क्रांति की है—ज्ञान का लोकतंत्रीकरण। स्टार्टअप, ओपन-सोर्स प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल सार्वजनिक ढाँचे—इन सबने भारत को एक नवाचार प्रयोगशाला बना दिया है। यही कारण है कि दुनिया आज भारत की ओर केवल निवेशक की तरह नहीं, बल्कि भागीदार की तरह देख रही है। भारत की वैश्विक पहचान अब “सीखने वाला देश” नहीं, बल्कि “सिखाने वाला देश” बनने की ओर बढ़ रही है।
लेकिन वैश्विक पहचान केवल चमक-दमक से नहीं टिकती। उसके लिए नैतिक आधार भी चाहिए। यहाँ फिर से युवा शक्ति की भूमिका निर्णायक हो जाती है। यदि युवा केवल सफलता की दौड़ में नैतिकता को छोड़ दें, तो वैश्विक पहचान खोखली हो जाएगी। भारत की विशिष्टता इसी में है कि वह भौतिक प्रगति के साथ आध्यात्मिक संतुलन की बात करता है। यह संतुलन आज की दुनिया को सबसे ज़्यादा चाहिए।
अंततः भारत की वैश्विक पहचान का भविष्य युवा हाथों में है। वे ही तय करेंगे कि भारत केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था रहेगा या एक विचारशील वैश्विक मार्गदर्शक बनेगा। जब युवा अपने कौशल, चरित्र और करुणा को एक साथ लेकर चलते हैं, तब भारत विश्व मंच पर केवल उपस्थित नहीं रहता—वह दिशा देता है। यही युवा शक्ति का सबसे बड़ा योगदान है—राष्ट्र के भीतर भी और विश्व के सामने भी।
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