दुनिया ने हिंदुओं को किस नज़र से देखा—और यह नज़र किसने गढ़ी?

यह सवाल अक्सर मुझे बेचैन करता है कि दुनिया हिंदुओं को जिस फ्रेम में देखती है, वह फ्रेम आखिर बना कैसे? क्या यह दृष्टि स्वाभाविक थी, या किसी ने सोच-समझकर इसे गढ़ा? और अगर गढ़ा गया, तो किसने—किस उद्देश्य से?
इतिहास पर नज़र डालते हुए धीरे-धीरे समझ में आता है कि भारत का उपनिवेशीकरण केवल सेनाओं, युद्धों और संधियों का परिणाम नहीं था। उससे कहीं पहले, और कहीं ज़्यादा प्रभावी ढंग से, यह काम विचारों के स्तर पर हो चुका था। तलवार से पहले कलम चली, और बंदूक से पहले पाठ्यक्रम बने।

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इतिहास सामान्यतः वही लिखता है जिसके हाथ में सत्ता होती है—यह हम सब जानते हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में एक दिलचस्प मोड़ है। यहाँ सत्ता पहले इतिहास लिखती है, और फिर उसी इतिहास के सहारे सत्ता को नैतिकता मिलती है। भारत को समझने, समझाने और परिभाषित करने का यह काम युद्धभूमि में नहीं, बल्कि लंदन के अध्ययन-कक्षों और दफ्तरों में हुआ।

इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण नाम है James Mill। उन्होंने भारत आए बिना ही भारतीय इतिहास को तीन हिस्सों में बाँट दिया—हिंदू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल। यह वर्गीकरण सुनने में जितना सरल लगता है, उतना ही खतरनाक था। ‘हिंदू काल’ को अंधविश्वास, जड़ता और सामाजिक पतन का दौर बताकर यह स्थापित कर दिया गया कि भारत स्वयं को सुधार नहीं सकता, उसे किसी बाहरी शक्ति की ज़रूरत है। इस तरह शासन नहीं, बल्कि ‘उद्धार’ का नैरेटिव तैयार हुआ।

यह सब किसी अकादमिक जिज्ञासा के तहत नहीं हो रहा था। इसके पीछे एक ठोस औपनिवेशिक हित था, जिसे आगे बढ़ा रही थी East India Company। व्यापार से शुरू हुई यह संस्था धीरे-धीरे सत्ता बन गई, और सत्ता को वैध ठहराने के लिए इतिहास की नई व्याख्याएँ गढ़ी गईं। भारतीय समाज को पिछड़ा, असमान और आंतरिक रूप से टूटा हुआ दिखाना ज़रूरी था—ताकि बाहरी शासन ‘ज़रूरी’ लगे।

यहीं से जाति-व्यवस्था और विशेषकर ब्राह्मणों की भूमिका को एक खास कोण से प्रस्तुत किया गया। ब्राह्मणों को ज्ञान-केन्द्रित, पर साथ ही दमनकारी, स्थायी शासक वर्ग के रूप में चित्रित किया गया। यह चित्रण इतना प्रभावी रहा कि सदियों बाद भी ब्राह्मणों पर आरोपों की भाषा लगभग वही है। प्रश्न यह नहीं कि भारतीय समाज में असमानताएँ थीं या नहीं—प्रश्न यह है कि क्या उन्हें उसी रूप में समझा गया, या उन्हें औपनिवेशिक सुविधा के अनुसार ढाला गया?

वास्तविक इतिहास कहीं अधिक जटिल है। ब्राह्मण कोई एकसार, अखंड सत्ता-समूह नहीं थे। समय, क्षेत्र और परिस्थितियों के अनुसार उनकी भूमिकाएँ बदलीं। कई ब्राह्मण औपनिवेशिक सत्ता के आलोचक भी रहे, सुधार आंदोलनों में भागीदार भी। लेकिन औपनिवेशिक इतिहास-लेखन को जटिलता नहीं चाहिए थी—उसे चाहिए था एक स्थायी खलनायक, जिससे ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सहज हो सके।

इस पूरी प्रक्रिया को निर्णायक रूप दिया शिक्षा-नीति ने। Lord Macaulay ने अंग्रेज़ी शिक्षा को श्रेष्ठ और भारतीय ज्ञान-परंपरा को हीन घोषित किया। यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं था; यह मानसिकता का प्रश्न था। भारतीयों को यह सिखाया गया कि उनका अतीत बोझ है और उनका भविष्य पश्चिमी मॉडल में है। यहीं से बौद्धिक उपनिवेशवाद की जड़ें और गहरी हुईं।

जाति-व्यवस्था, जो भारतीय समाज में सदियों से बदलती, ढलती और स्थान-विशेष के अनुसार अलग-अलग रूप लेती रही थी, उसे औपनिवेशिक शासन ने स्थिर और कठोर खाँचों में बाँध दिया। जनगणनाओं, वर्गीकरणों और कानूनी श्रेणियों ने जाति को सामाजिक यथार्थ से उठाकर राजनीतिक औज़ार बना दिया। इसके प्रभाव आज भी दिखते हैं—नीतियों में, विमर्शों में और आरोपों की भाषा में।

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आज जब हम आधुनिक भारत में जाति और ब्राह्मण-विमर्श को देखते हैं, तो कई बार लगता है कि हम अनजाने में वही औपनिवेशिक चश्मा लगाए हुए हैं। आरोप नए लग सकते हैं, शब्दावली बदली हुई हो सकती है, लेकिन ढांचा वही है—सरलीकरण, सामान्यीकरण और ऐतिहासिक जटिलता से परहेज़।

उपनिवेशवाद का सबसे बड़ा सच यही है कि उसने केवल भूभाग नहीं छीना, उसने आत्मबोध छीना। उसने यह तय कर दिया कि हम अपने इतिहास को कैसे देखें, अपने समाज को कैसे समझें और खुद को दुनिया के सामने कैसे परिभाषित करें। इसलिए स्वतंत्रता केवल राजनीतिक घटना नहीं थी; वह एक अधूरा बौद्धिक प्रोजेक्ट भी है।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम इतिहास को नए सिरे से पढ़ें—न तो आत्मगौरव के अंधे उत्साह में, न ही आत्मग्लानि के औपनिवेशिक बोझ के साथ। जाति, धर्म और समाज पर बातचीत करते समय यह समझना ज़रूरी है कि कई धारणाएँ हमारी अपनी नहीं, बल्कि हमें दी गई हैं।

दुनिया ने हिंदुओं को कैसे देखा—इससे ज़्यादा अहम सवाल यह है कि अब हम खुद को कैसे देखना चाहते हैं। शायद यहीं से वास्तविक विमुक्ति की शुरुआत होगी।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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