जब समय भी समय का इंतज़ार करता है
हम में से ज़्यादातर लोग समय को एक सीधी रेखा की तरह देखते हैं—घड़ी की टिक-टिक, कैलेंडर के पन्ने, जन्म से मृत्यु तक की एक सीमित यात्रा। आधुनिक विज्ञान ने हमें यह सिखाया कि समय सार्वभौमिक नहीं है; वह स्थान, गति और गुरुत्वाकर्षण के अनुसार बदल सकता है। लेकिन यह समझ अक्सर हमें बीसवीं सदी की देन लगती है—मानो समय की सापेक्षता का बोध पहली बार आधुनिक भौतिकी ने कराया हो।
पर क्या सचमुच ऐसा है?
यदि हम अपने प्राचीन ग्रंथों के भीतर झाँकें, तो समय को लेकर एक ऐसा दृष्टिकोण मिलता है, जो न केवल आधुनिक विज्ञान से मेल खाता है, बल्कि कई मायनों में उससे कहीं अधिक विराट और डरावना है। श्रीमद्भागवत पुराण के नवम स्कंध में वर्णित राजा ककुद्मी की कथा इसी का उदाहरण है—एक ऐसी कथा, जो पौराणिक आख्यान से आगे बढ़कर हमें ब्रह्मांडीय समय की भयावह सच्चाई से रूबरू कराती है।

यह कथा सतयुग की है। राजा ककुद्मी सूर्यवंश के प्रतापी शासक थे। उन्होंने कुशस्थली नामक नगरी पर शासन किया—जो आगे चलकर द्वारका के रूप में जानी गई। पर उनकी समस्या किसी युद्ध या सत्ता से जुड़ी नहीं थी; वह एक पिता की चिंता थी। उनकी पुत्री रेवती अनुपम सौंदर्य और दिव्य गुणों से युक्त थी। पृथ्वी के राजाओं में उन्हें कोई ऐसा वर नहीं दिखा, जो उसकी योग्य हो।
राजा ने वही किया, जो आज के संदर्भ में अकल्पनीय लगता है। उन्होंने समुद्र पार नहीं किया, देशों की यात्रा नहीं की—उन्होंने लोकों की यात्रा की। योगिक सिद्धियों के बल पर वे अपनी पुत्री सहित भूलोक की सीमाओं को पार करते हुए सतलोक पहुँचे—ब्रह्मा का धाम, चौदह लोकों में सर्वोच्च।
यहाँ से कथा एक अद्भुत मोड़ लेती है। सतलोक पहुँचकर राजा को ज्ञात होता है कि ब्रह्मा इस समय व्यस्त हैं—गंधर्वों के दिव्य संगीत में लीन। राजा प्रतीक्षा करते हैं। उनके लिए यह प्रतीक्षा कुछ क्षणों की है—एक मधुर संगीत सभा जितनी। वे सोचते हैं, जैसे ही अवसर मिलेगा, वे अपनी समस्या रख देंगे और लौट आएँगे।
पर जिस क्षण वे सतलोक में खड़े होकर संगीत सुन रहे थे, उसी क्षण पृथ्वी पर समय उन्मत्त गति से बह रहा था। राजवंश मिट रहे थे, सभ्यताएँ उभर और ढह रही थीं, युग बदल रहे थे। राजा को इसका कोई बोध नहीं था।
जब संगीत समाप्त होता है और राजा ब्रह्मा के समक्ष अपना प्रश्न रखते हैं—कि पृथ्वी के कौन-से राजा उनकी पुत्री के योग्य हैं—तो ब्रह्मा मुस्कुराकर एक वाक्य कहते हैं, जो इस कथा को साधारण पौराणिक प्रसंग से अस्तित्वगत भय में बदल देता है। वे बताते हैं कि जिन राजाओं के नाम राजा ने सोचे थे, वे सभी समय की धारा में बह चुके हैं। न केवल वे, बल्कि उनकी कई पीढ़ियाँ भी समाप्त हो चुकी हैं।

राजा कुछ ही मिनट सतलोक में रुके थे, लेकिन पृथ्वी पर सत्ताईस चतुर्युग बीत चुके थे—लगभग 11.66 करोड़ वर्ष।
अब ज़रा कल्पना कीजिए—आप किसी कार्यालय में बीस मिनट की बैठक से निकलें और बाहर की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी हो। आपकी भाषा, आपकी पहचान, आपका वंश—सब इतिहास की किताबों में दफ़न हो चुका हो। यही वह क्षण है, जहाँ यह कथा रोमांच नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भय बन जाती है।
यह संभव कैसे हुआ?
उत्तर छिपा है वैदिक समय-गणना में। वेदों और पुराणों में समय को क्षणिक नहीं, बल्कि बहुस्तरीय और सापेक्ष माना गया है। एक चतुर्युग—जिसमें सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग आते हैं—कुल 43 लाख 20 हज़ार वर्षों का होता है। सत्ताईस चतुर्युग यानी करोड़ों वर्षों की अवधि।
आधुनिक भौतिकी आज जिसे टाइम डाइलेशन कहती है, वही सिद्धांत यहाँ प्रतीकात्मक रूप में मौजूद है। आधुनिक विज्ञान बताता है कि जहाँ गुरुत्वाकर्षण अधिक होता है या जहाँ स्पेस-टाइम की संरचना अलग होती है, वहाँ समय धीमा चलता है। ब्लैक होल के पास कुछ घंटे पृथ्वी पर वर्षों के बराबर हो सकते हैं।
पुराण सतलोक को उच्चतम कम्पन, शुद्धता और ब्रह्मांडीय आवृत्ति का लोक बताते हैं। वहाँ समय का प्रवाह पृथ्वी से भिन्न है। राजा ककुद्मी का शरीर उसी लोक की समय-आवृत्ति से जुड़ा था, जबकि पृथ्वी अपनी तेज़ गति से युगों को निगलती जा रही थी।
यहाँ कथा हमें एक गहरा बौद्धिक संकेत देती है—समय सार्वभौमिक नहीं, स्थानीय है। हर लोक, हर आयाम, हर अस्तित्व-स्तर का अपना समय है। भूलोक के नियम सतलोक पर लागू नहीं होते।
राजा जब लौटते हैं, तो पृथ्वी उन्हें पहचानती नहीं। मनुष्य कद में छोटे हो गए हैं, चेतना में भी। उनकी पुत्री रेवती उस युग के लोगों से कहीं विशाल प्रतीत होती है। अंततः ब्रह्मा की सलाह पर उनका विवाह बलराम से होता है—और प्रतीकात्मक रूप से रेवती को उस युग के अनुरूप ढाला जाता है। यह केवल शारीरिक परिवर्तन नहीं, बल्कि उच्च चेतना का सघन वास्तविकता में अवतरण है।
इस कथा का संदेश आज के मनुष्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। हम अपने छोटे-छोटे संकटों, समय की कमी, जीवन की हड़बड़ी में उलझे रहते हैं। लेकिन ब्रह्मांडीय दृष्टि से हमारा पूरा जीवन ब्रह्मा की एक पलक झपकने जितना है।
राजा ककुद्मी की कथा हमें विनम्र बनाती है। वह याद दिलाती है कि हमारी वास्तविकता एक विशाल, बहुआयामी सिम्फनी का केवल एक सुर है। और शायद सबसे गहरी बात यह है कि जिस सत्य को आधुनिक विज्ञान आज समीकरणों और यंत्रों से समझने की कोशिश कर रहा है, उसे हमारे ऋषियों ने अंतर्दृष्टि से बहुत पहले देख लिया था।
समय चलता नहीं—हम समय के भीतर चलते हैं।
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