ये प्रशासन है, इसे सोते रहने दो

ये प्रशासन है, इसे सोते रहने दो

शहर ने कई मौसम देखे हैं—बरसात में बहती गंधाती नालियाँ, चुनाव में बहते बहकते-फुसलाते वादे, और त्योहारों में बदरंग बहता हुड़दंग भी। पर इस बार जो भिनभिनाता, गंधाता हुआ बह रहा है, वह है—“प्रशासनिक जोश”। जाने क्यों शहर को प्रशासन का सोते रहना रास नहीं आया। उसे जगाने की ठान ली गई। शिकायतों का अंबार, नारेबाज़ी, और कुछ प्रबुद्धजन पहुँच गए प्रशासन के पास—“आपको शर्म आनी चाहिए! आप सो रहे हैं और शहर का हाल देखिए!”

कुंभकर्णी प्रशासन ने करवट बदली, अंगड़ाई ली। “लो जी, हम जाग गए। अब लेते हैं शहर की खबर!” और सचमुच, जागते ही बड़ा चुस्त-दुरुस्त, एकदम सतर्क।

प्रशासन पूरे लवाज़मे, लाव-लश्कर के साथ शहर की खबर लेने निकला। उधर दुकानदार अपने-अपने संघर्षों में उलझे थे—कोई दो जून की रोटी का जुगाड़ कर रहा था, कोई ऑनलाइन बाज़ार से जूझ रहा था, कोई टैक्स और फीस की गुत्थियों में फँसा था। उन्हें क्या खबर कि “बड़े अफसर” शहर में दौरा कर रहे हैं! अफसर की गाड़ी गुजरती रही और वे अपने तख्तों पर बैठे रहे।

अरे भई, ऐसा होता है कहीं? राजा की सवारी निकले और प्रजा न झुके?
मित्र, थोड़ी दुनियादारी भी आनी चाहिए! आगे बढ़कर दंडवत करना चाहिए था। मंदिर में चढ़ावा चढ़ाते समय जैसे झुकते हो, वैसे ही झुको। पर बाजार का व्यापारी, जो हर महीने टैक्स भरकर खुद को निश्चिंत समझ लेता है, वह श्रद्धा-भाव का महत्व समझ न पाया। उसने सोचा—“मैं भुगतान कर चुका हूँ।” उसे क्या पता था कि भुगतान के साथ ‘प्रणाम’ भी अनिवार्य होता है।

अब विकास की खबर ली जाए। प्रशासन की निगाह में विकास के दो ही मानक हैं—सड़क और नालियाँ। “विकास” शब्द सुनते ही सबसे पहले नाली याद आती है। बाजार में देखा—नालियाँ विकास से अभिभूत होकर उफन पड़ी थीं। कहीं-कहीं नालियाँ चबूतरों के नीचे दबी थीं, अपने विकास को पेट में समेटे हुए। यह प्रशासन को बुरा लगा। “विकास को खुलकर सामने आना चाहिए। उसे ढँकना अवैध है!”

वे चबूतरे—दुकानों के आगे बने वे छोटे-छोटे मंच—जहाँ चाय पी जाती थी, उधार लिखा जाता था, ग्राहकों से मुस्कान का लेन-देन होता था—अचानक “अवैध” घोषित कर दिए गए। जैसे सूरज निकले और कह दे—“आज से तुम्हारी छाया गैरकानूनी है।”

देखो तो प्रशासन की ताकत, मित्र! तांडव-सा दृश्य। मजाल कि कोई चूँ तक बोले। आपने जगाया है न प्रशासन को? अब भुगतो। क्यों बिलबिला रहे हो?

फिर वही हुआ जो होना था। बुलडोज़र, जो इतने दिन नगर परिषद के कोने में जंग खा रहे थे, उन्हें भी जगाया गया। चबूतरे टूटे, ईंटें बिखरीं—और उन ईंटों के साथ कई छोटे सपने भी।

आप पूछिए—“बिना नोटिस? अचानक?”
अरे भाई, नोटिस भेज दिया जाता तो आप सतर्क हो जाते। खुद ही अतिक्रमण हटा लेते। फिर तोड़ने का मज़ा कहाँ आता? प्रशासन की ताकत कैसे दिखती?

मकूल जवाब तैयार हैं—नालियों का सुंदरीकरण, रास्ता चौड़ा करना, या बस यह बताना कि “हम जाग गए हैं।”

अब देखिए नालियाँ—खुले मुँह सुरसा की तरह। जो बदबू दबे पाँव बहती थी, वह अब खुलकर विकास की सुगंध बनकर नथुनों में प्रवेश कर रही है। होली पास है। रंगों का मौसम है। अब कोई चाहे तो किसी को रंग के साथ नाली में भी डुबो सकता है—व्यवस्था ने सहूलियत दे दी है।

शहर के कुछ लोग रात में दरवाज़ा देखकर सोते हैं—“कहीं अगली बारी हमारी तो नहीं?”

उधर नेता लोग—जो इसी बाजार की हवा के रुख से अपनी सीटें कब्जाते हैं—जानते हैं कि जब प्रशासन सोता है तब नेता जागते हैं, और जब प्रशासन जागता है तब नेता सो जाते हैं। दुबक जाते हैं अपने-अपने दड़बों में। “चिंता मत करो, चुनाव दूर हैं। जनता की याददाश्त छोटी होती है।”

दुकानदार बिलबिला रहे हैं। उन्हें यह विकास रास नहीं आ रहा। शहर डरा-सहमा खड़ा है—टूटी ईंटों पर, खुली नालियों के किनारे, अपने ही सपनों के मलबे पर।

“आप प्रशासन को अकर्मण्य बता रहे हैं?”
अरे भाई, प्रशासन पेसोपेश में था कि अपनी उपस्थिति कैसे दर्ज कराए। अब दर्ज करा दी है तो दर्द क्यों हो रहा है? सत्ता के पास शक्ति है, और शक्ति यदि प्रयोग में न लाई जाए तो जंग खा जाती है। बुलडोज़र भी आखिर कब तक कोने में खड़ा-खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता?

अब आप सोचने लगे, मित्र—यह आपके शहर की कहानी है?
हो सकता है। हर शहर की हो सकती है।
हो न हो, आपने भी प्रशासन को जगाने की भूल कर दी हो।
अब भुगतो।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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