अनुवाद को सिर्फ शब्दों का स्थानांतरण नहीं, संस्कृतियों का संप्रेषण माना जाना चाहिए । यह वह सेतु है जिस पर चलते हुए हम एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं, एक सभ्यता से दूसरी सभ्यता में प्रवेश करते हैं। जिस प्रकार एक चिकित्सक (यदि मैं अपने पेशे की उपमा लूँ) केवल शरीर नहीं देखता, उसके भीतर की नाड़ी, इतिहास, परिवेश और जीवन-शैली को समझता है; ठीक उसी तरह अनुवादक केवल वाक्य नहीं देखता, वह शब्दों के पीछे छिपे समय, समाज और संवेदना को पढ़ता है।
अनुवाद को यदि केवल “ट्रांसफर ऑफ मीनिंग” मान लिया जाए तो वह निस्संदेह गणितीय हो जाएगा—एक शब्द के सामने दूसरा शब्द। परंतु साहित्य का हृदय शब्दकोश में नहीं धड़कता; वह सांस्कृतिक स्मृतियों, ऐतिहासिक आघातों और सामूहिक अनुभवों में धड़कता है। इसलिए कहा गया है—अनुवाद एक गंभीर सृजनकर्म है। यह पुनर्रचना है, पुनर्जन्म है।
क्या अनुवाद चुनौतीपूर्ण कार्य है? निस्संदेह। क्योंकि अनुवादक को दो नावों पर संतुलन साधना होता है—मूल रचना के प्रति निष्ठा और लक्ष्य भाषा की स्वाभाविकता। यदि वह मूल के प्रति अत्यधिक कठोर हो जाए तो अनुवाद बोझिल हो जाता है; यदि लक्ष्य भाषा की सहजता में बह जाए तो मूल की आत्मा क्षीण हो सकती है। यह रस्सी पर चलने जैसा कौशल है।
हिंदी साहित्य में अनुवाद ने एक नई दृष्टि दी है। उदाहरण के लिए, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बांग्ला कृतियाँ जब हिंदी में आईं—‘गोरा’, ‘घरे-बैरे’—तो उन्होंने हिंदी पाठकों को बंगाल के नवजागरण से परिचित कराया। इसी तरह शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास—‘देवदास’, ‘परिणीता’, ‘चरित्रहीन’—हिंदी में अनूदित होकर मध्यवर्गीय समाज की भावनात्मक जटिलताओं का दर्पण बन गए।
रूसी साहित्य के अनुवादों ने हिंदी के वैचारिक क्षितिज को व्यापक किया। लेव तोलस्तोय की ‘युद्ध और शांति’ तथा ‘अन्ना कारेनिना’, फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की की ‘अपराध और दंड’, मैक्सिम गोर्की की ‘माँ’—इन कृतियों ने केवल कथा नहीं दी, बल्कि सामाजिक न्याय, वर्ग संघर्ष और नैतिक द्वंद्व की गहरी समझ दी। 20वीं सदी के हिंदी पाठक के लिए यह साहित्य वैचारिक क्रांति का द्वार था।
लैटिन अमेरिकी साहित्य का जादू भी अनुवाद के माध्यम से हिंदी तक पहुँचा। गेब्रियल गार्सिया मार्केज़ के ‘एकांत के सौ वर्ष’ ने जादुई यथार्थवाद की ऐसी धारा प्रवाहित की, जिसने हिंदी के कथाकारों को भी प्रभावित किया।
फ्रांसीसी लेखक अल्बेयर कामू की ‘द प्लेग’ (महामारी) और ‘द स्ट्रेंजर’ (अजनबी) के हिंदी अनुवादों ने अस्तित्ववाद की जटिलताओं को सरल भाषा में प्रस्तुत किया। इसी प्रकार पाओलो कोएल्हो की ‘द अलकेमिस्ट’ (कीमियागर) ने आध्यात्मिक खोज की कथा को लोकप्रियता दी।
अंग्रेज़ी साहित्य से जॉर्ज ऑरवेल की ‘एनिमल फार्म’ और ‘1984’ जब हिंदी में आईं, तो उन्होंने सत्ता और निगरानी की राजनीति को नए ढंग से समझने का अवसर दिया।
केवल पश्चिमी साहित्य ही नहीं—दक्षिण भारतीय भाषाओं से हुए अनुवादों ने हिंदी को समृद्ध किया। मलयालम के लेखक ओ.वी. विजयन, तमिल के जयकांतन, कन्नड़ के यू.आर. अनंतमूर्ति—इनकी रचनाएँ हिंदी में आईं तो भारतीय समाज की विविधता का नया आयाम खुला।
अनुवाद ने हिंदी साहित्य को आत्मकेंद्रित होने से बचाया है। उसने हिंदी को विश्व-संवाद का सहभागी बनाया है। आज 21वीं सदी में जब वैश्वीकरण और डिजिटल युग ने दूरी मिटा दी है, तब अनुवाद सांस्कृतिक राजनय का प्रभावी औजार बन गया है। किसी देश की राजनीति से पहले उसकी कविता पहुँचती है; किसी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था से पहले उसकी कहानियाँ पाठक के मन में घर करती हैं।
इस दृष्टि से अनुवाद केवल साहित्यिक कर्म नहीं, सांस्कृतिक कूटनीति भी है। यह मनुष्यता के साझा अनुभवों का आदान-प्रदान है। हम जब किसी विदेशी कृति का अनुवाद पढ़ते हैं तो पाते हैं कि मनुष्य की पीड़ा, प्रेम, संघर्ष और स्वप्न सार्वभौमिक हैं। भाषा अलग हो सकती है, पर आँसू और हँसी का अर्थ समान रहता है।
अतः अनुवाद को द्वितीयक साहित्य न मानकर मूल सृजन के समकक्ष सम्मान देना चाहिए। वह पुल है, प्रकाश है, संवाद है—और सबसे बढ़कर, वह सहानुभूति का विस्तार है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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