नकली इनोवेशन, नकली शर्म यही है हमारी कहानी ,एक भारतीय की कहानी इसे किसी एक विश्वविद्यालय, एक रोबोट या एक मंच की कहानी नहीं समझें ; यह हमारे समय का आईना है। हाल ही में हुए Galgotia University के AI Summit में एक चीनी रोबोट को “स्वदेशी आविष्कार” बताकर प्रस्तुत करने का विवाद सामने आया। कुछ लोगों ने इसे एक तकनीकी भूल कहा, कुछ ने प्रबंधन की चूक, कुछ ने इसे पीआर की अतिउत्साही रणनीति बता कर टाल दिया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सचमुच एक “इंसिडेंट” है? या यह उस सामूहिक मानसिकता का लक्षण है, जिसमें हम सच्चाई से अधिक दृश्यता को महत्व देते हैं, शोध से अधिक रील को, परिश्रम से अधिक प्रस्तुति को?
हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ मंच की सजावट प्रयोगशाला से बड़ी हो गई है। जहाँ रोशनी इतनी तेज कर दी जाती है कि सच्चाई की झुर्रियाँ दिखाई ही न दें। जहाँ उद्घाटन का रिबन काटना शोधपत्र लिखने से अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। और जहाँ “मेड इन इंडिया” की घोषणा करना “मेड बाय मी” की ईमानदार स्वीकारोक्ति से कहीं अधिक लाभकारी समझा जाता है। यह प्रवृत्ति केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है; यह हमारे समाज के हर उस कोने में है जहाँ हम दिखावे के पीछे पागल हो चुके हैं।
गलती होना मानव स्वभाव है, पर गलती के बाद उसे स्वीकारने के बजाय उसे ढकने की कला विकसित कर लेना सामाजिक बीमारी है। हम बार-बार वही चक्र दोहराते हैं—कुछ बड़ा दिखाने की जल्दबाज़ी, आधी तैयारी, पूरी घोषणा, फिर पर्दाफाश, फिर सफाई, फिर भूल जाना। क्या यह वही चक्र नहीं है जिसमें हम फँसे हुए हैं? हमें लगता है कि यदि हम पर्याप्त आत्मविश्वास से कुछ कह दें तो वह सच बन जाएगा। जैसे कोई बच्चा खिलौना कार पर ‘मर्सिडीज़’ का स्टिकर लगा दे और उम्मीद करे कि पड़ोसी प्रभावित हो जाएँगे।
लेकिन यह केवल संस्थागत दिखावा नहीं है। यह हमारी निजी ज़िंदगी में भी घुस आया है। क्या हम अपनी काबिलियत बढ़ाने के बजाय पड़ोसियों को प्रभावित करने में नहीं लगे हैं? क्या हम ऐसी चीज़ें नहीं चुनते जो बाहर से चमकदार हों, अंदर से खोखली? क्या हम ऐसे दोस्तों के साथ नहीं रहते जो हमारी हकीकत बताने के बजाय हमारी झूठी छवि को और पॉलिश करते रहें? क्या हम बच्चों को समझ देने के बजाय केवल डिग्री दिलाने में व्यस्त नहीं हैं? ‘बंटी’ की डिग्री ज़रूरी है, उसकी समझ नहीं—यह सोच धीरे-धीरे हमारे सामाजिक डीएनए में घुल चुकी है।
आज क्वालिटी का भारतीयकरण एक अजीब रूप ले चुका है—ऊपर से चमकदार, अंदर से घटिया। जैसे किसी इमारत के सामने संगमरमर की शीट लगा दी जाए और भीतर की दीवारें कच्ची ही छोड़ दी जाएँ। हम पैकेजिंग के उस्ताद बन चुके हैं। हमें पता है कि किस एंगल से फोटो खिंचवानी है, किस शब्द से प्रेस रिलीज़ सजानी है, किस हैशटैग से ट्रेंड बनाना है। पर हमें यह नहीं मालूम कि मूल प्रश्न क्या था, शोध की पद्धति क्या थी, सत्यापन कहाँ है। हमें प्रोजेक्टर चाहिए, पर प्रोजेक्ट नहीं।
यह प्रवृत्ति केवल तकनीक में नहीं है। राजनीति में, शिक्षा में, व्यापार में, यहाँ तक कि अध्यात्म में भी। हम मूवी सेट पर जी रहे हैं। सामने किले की दीवार खड़ी है, पीछे बाँस का ढाँचा। कैमरा सामने से घूमता है, दर्शक ताली बजाते हैं, और हम भूल जाते हैं कि यह असली किला नहीं है। असली किला बनाने में समय लगता है, पसीना लगता है, आलोचना सहनी पड़ती है। नकली किला बनाने में केवल रंग-रोगन और लाइटिंग चाहिए।
और सबसे बड़ा प्रश्न—राष्ट्र कौन है? जब हम कहते हैं कि यह राष्ट्रीय शर्म है, तो उँगली किस ओर उठती है? किसी कुलपति की ओर? किसी आयोजक की ओर? या हमारी ओर? राष्ट्र कोई अमूर्त देवता नहीं है जो कहीं आसमान में बैठा हो। राष्ट्र हम हैं—हमारी आदतें, हमारी प्राथमिकताएँ, हमारी चुप्पियाँ। यदि हम हर बार तालियाँ बजाते हैं बिना यह पूछे कि सच्चाई क्या है, तो हम भी इस भ्रम के सहभागी हैं। यदि हमें केवल “बड़ा इवेंट” चाहिए और “गहरा काम” नहीं, तो दोष साझा है।
हमें ऐसे समाज की ज़रूरत है जो विद्रोहियों को सज़ा न दे। जो सवाल पूछने वालों को “नकारात्मक” कहकर चुप न कराए। जो कह सके—हाँ, हमने गलती की। हाँ, यह रोबोट हमारा नहीं था। हाँ, हमें और मेहनत करनी होगी। पर हमारी संस्कृति में ईमानदार स्वीकारोक्ति को कमजोरी समझा जाता है। हम उस बच्चे को डाँटते हैं जो कहे कि बादशाह नंगा है, और उन दरबारियों को सम्मानित करते हैं जो झूठ को अलंकारिक भाषा में सच बना दें।
आपसी धोखा हमारे रिश्तों में भी उतर आया है। हम अपने मित्र से यह नहीं कहते कि वह जिस राह पर चल रहा है वह खोखली है। हम अपने सहकर्मी से यह नहीं कहते कि उसकी प्रस्तुति चमकदार है पर शोध अधूरा। हम अपने बच्चे से यह नहीं कहते कि डिग्री से अधिक समझ ज़रूरी है। हम सब एक-दूसरे की झूठी कहानी को सच की तरह दोहराते रहते हैं, क्योंकि सच बोलना असुविधाजनक है। और धीरे-धीरे हम स्वयं भी उस झूठ पर विश्वास करने लगते हैं।
आईने से डरना हमारी सबसे बड़ी समस्या है। हम खुद को जानने से बचते हैं। क्योंकि खुद को जानना मतलब अपनी कमियों को स्वीकारना। यह स्वीकारना कि हम अभी उतने सक्षम नहीं हैं जितना मंच पर कह दिया। कि हमारी प्रयोगशाला में अभी उतने उपकरण नहीं हैं जितना ब्रोशर में छप गया। कि हमारी टीम को अभी और प्रशिक्षण चाहिए। पर हम इस यात्रा की धीमी, कठिन प्रक्रिया से भागते हैं। हमें तुरंत परिणाम चाहिए, तुरंत तालियाँ चाहिए, तुरंत प्रमाणपत्र चाहिए।
असली शोध और मेहनत में ग्लैमर कम होता है। वह कैमरे के सामने नहीं, लैब के भीतर पनपता है। वह कई असफल प्रयोगों के बाद जन्म लेता है। वह वर्षों की तैयारी, निराशा, पुनःप्रयास और आत्मालोचना से गुजरता है। पर जब समाज का पुरस्कार तंत्र केवल दिखावे को पुरस्कृत करने लगे, तो युवा भी उसी दिशा में दौड़ते हैं। उन्हें लगता है कि पीआर एजेंसी, सोशल मीडिया टीम और आकर्षक मंच ही सफलता का शॉर्टकट हैं।
अब समय आ गया है इस आपसी धोखे को बंद करने का। हमें क्वालिटी को सस्तेपन में बदलने की आदत छोड़नी होगी। हमें यह समझना होगा कि मौलिकता न तो आयात की जा सकती है, न ही घोषणा से पैदा की जा सकती है। वह भीतर की बौद्धिक ईमानदारी से जन्म लेती है। जब हम कहेंगे—हम अभी सीख रहे हैं। जब हम स्वीकारेंगे—हमारी तकनीक अभी शुरुआती स्तर पर है। जब हम अपने बच्चों को सिखाएँगे कि प्रभाव से अधिक सार महत्वपूर्ण है। तब शायद हम उस असली, तेज़ और खोजी बुद्धि को वापस पा सकेंगे जिसके लिए यह देश जाना जाता था।
यह घटना शर्मिंदगी का कारण हो सकती है, पर यदि हमने इससे सीखा तो यह मोड़ भी बन सकती है। प्रश्न यह नहीं है कि एक रोबोट कहाँ से आया था। प्रश्न यह है कि हमारी सोच कहाँ से आ रही है और कहाँ जा रही है। यदि हम आईने में देखने का साहस जुटा लें, तो शायद अगली बार मंच पर जो खड़ा होगा वह केवल चमकता हुआ खिलौना नहीं, बल्कि सचमुच का नवाचार होगा—भले वह छोटा हो, पर अपना होगा, ईमानदार होगा। और शायद तब हमें दिखावे के पीछे पागल होने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि असलियत ही हमारी पहचान बन चुकी होगी।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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