सम्पूर्ण गीता: दर्शन, समन्वय और आधुनिक जीवन का मार्ग

जब हम “सम्पूर्ण गीता” को देखते हैं तो वह किसी एक विचारधारा का घोषणापत्र नहीं लगती, न ही वह केवल आध्यात्मिक उपदेशों की श्रृंखला है। वह मानो मनुष्य के भीतर चल रहे समूचे दार्शनिक संघर्ष का संवाद है—कर्तव्य और करुणा के बीच, ज्ञान और कर्म के बीच, त्याग और सहभागिता के बीच, निर्गुण और सगुण के बीच। गीता की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी एक रेखा पर नहीं चलती; वह वृत्त की तरह है—जिसका केंद्र स्थिर है पर परिधि बहुआयामी। उसका केन्द्रीय स्वर समन्वय है।

गीता का मूल कथन सरल है पर गहरा—कर्म से बचा नहीं जा सकता, पर कर्म से चिपके रहना वैकल्पिक है। मनुष्य को कर्म करना ही है, क्योंकि जीवन स्वयं गति है; पर उस कर्म का परिणाम ही उसकी पहचान न बन जाए, यह विवेक सीखना पड़ता है। ज्ञान यहाँ केवल दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि दृष्टि है—वह देखने का ढंग जो मनुष्य को अपने भीतर के कर्ता और साक्षी के बीच भेद सिखाता है। और भक्ति? वह भावुक आर्तनाद नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन है। गीता की भक्ति करुणा-आधारित आचरण है, जहाँ समता और अनासक्ति मिलकर मनुष्य को भीतर से हल्का बनाती हैं। अंतिम लक्ष्य किसी नाटकीय संन्यास का प्रदर्शन नहीं, बल्कि मोह का क्षय और स्थिर बुद्धि की उपलब्धि है।

सांख्य के साथ संवाद में गीता विश्लेषण की भाषा अपनाती है। पुरुष और प्रकृति का भेद, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की चर्चा, गुणों का विश्लेषण—यह सब सांख्य की पद्धति का उपयोग है। पर गीता यहाँ रुकती नहीं। जहाँ सांख्य मुक्ति को पुरुष का प्रकृति से पृथक्करण बताता है और ईश्वर को अनिवार्य तत्व नहीं मानता, वहाँ गीता उसी विश्लेषण को आधार बनाकर कहती है कि अंतिम आश्रय केवल वैचारिक पृथक्करण नहीं, बल्कि पुरुषोत्तम की शरण है। वह द्वैत को औज़ार बनाती है, पर लक्ष्य अद्वैत-स्वरूप की अनुभूति में रखती है।

योग के संदर्भ में गीता मन के अनुशासन को स्वीकार करती है। अभ्यास और वैराग्य, संतुलित आहार-विहार, चित्त की स्थिरता—ये सब पातंजल योग की प्रतिध्वनियाँ हैं। किंतु गीता योग को जीवन से पलायन नहीं बनने देती। वह कहती है—स्मरण और युद्ध साथ-साथ संभव हैं। ध्यान और कर्तव्य विरोधी नहीं। यहाँ योग तपस्वी के एकांत की संपत्ति नहीं, गृहस्थ और योद्धा दोनों की साधना है।

वेदान्त के भीतर भी गीता का स्वर बहुस्तरीय है। अद्वैत के निकट जाते हुए वह साक्षीभाव, समदर्शन और ब्रह्मभाव की चर्चा करती है—“मैं कर्ता नहीं” की अंतर्दृष्टि देती है। पर वही गीता ईश्वर की शरण, कृपा और अनन्य भक्ति को भी केन्द्रीय बनाती है। विशिष्टाद्वैत की तरह वह जीव और जगत को ईश्वर से अभिन्न पर आश्रित रूप में देखती है; द्वैत की तरह भक्ति को परम मार्ग भी कहती है। इसलिए उसे किसी एक वेदान्त में बंद करना कठिन है। वह अद्वैत की दृष्टि को भक्ति की ऊष्मा से जोड़ती है—दर्शन और प्रेम का ऐसा संगम जिसमें बुद्धि और हृदय विरोधी नहीं रहते।

मीमांसा के कर्मकांड-प्रधान दृष्टिकोण से संवाद करते हुए गीता कर्म को अस्वीकार नहीं करती, पर उसकी दिशा बदल देती है। यज्ञ अब स्वर्ग-प्राप्ति का साधन नहीं, बल्कि अंतःशुद्धि का माध्यम बन जाता है। कर्म बाहरी अनुष्ठान नहीं, बल्कि भीतर की गुणवत्ता है। फल-त्याग का अर्थ कर्म-त्याग नहीं, बल्कि अहंकार-त्याग है। यहाँ कर्म का केंद्र बदल जाता है—लाभ से धर्म की ओर, स्वार्थ से समत्व की ओर।

बौद्ध दर्शन के साथ तुलना करें तो तृष्णा और दुःख का संबंध दोनों में मिलता है। गीता भी कहती है कि इंद्रिय-सुख अंततः दुःख-योनि है। अनासक्ति और करुणा दोनों में समान हैं। अंतर वहाँ आता है जहाँ बौद्ध परंपरा स्थायी आत्मा को अस्वीकार करती है, जबकि गीता आत्मा को नित्य और अविनाशी कहती है। पर मनोवैज्ञानिक धरातल पर लक्ष्य समान दिखता है—अहंकार की पकड़ ढीली करना, साक्षी बनना, करुणा जीना।

जैन दर्शन की कठोर अहिंसा और संन्यास-प्रधान आदर्श के सामने गीता कर्मभूमि का पक्ष लेती है। वह अहिंसा को मूल्य मानती है, पर स्वधर्म से पलायन को समाधान नहीं। जीवन में कुछ कर्म अनिवार्य हैं; प्रश्न यह है कि वे किस भाव से किए जाते हैं। जैन अनुशासन हिंसा को न्यूनतम करने की कठोर साधना है; गीता का आग्रह है कि कर्म को शुद्ध करो—द्वेष और लोभ को घटाओ।

भक्ति परंपराओं में गीता की भक्ति विशिष्ट है। वह केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि चरित्र की परिभाषा है। जो द्वेष-रहित है, करुणामय है, क्षमाशील है, समता में स्थित है—वही सच्चा भक्त है। यहाँ भक्ति का अर्थ बाहरी प्रदर्शन नहीं, भीतर की दिशा है।

अध्याय 8 और 11 गीता को अस्तित्ववादी गहराई देते हैं। मृत्यु का स्मरण जीवन की दिशा का दर्पण बन जाता है। विश्वरूप में समय की विराटता दिखती है—व्यक्ति समझता है कि वह संपूर्ण व्यवस्था का केंद्र नहीं, एक निमित्त है। यह बोध निराशा नहीं देता, बल्कि जिम्मेदारी देता है। नियंत्रण का भ्रम छोड़कर कर्तव्य में लग जाना—यही आधुनिक अर्थ है।

अंततः गीता स्वधर्म, समत्व और समर्पण को एक सूत्र में बाँधती है। स्वधर्म का अर्थ है अपनी प्रकृति और भूमिका के अनुरूप कर्म करना। समत्व का अर्थ है परिणामों में संतुलित रहना। समर्पण का अर्थ है अहंकार की अंतिम गाँठ खोल देना। यह बुद्धि का आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन है।

इस प्रकार गीता किसी एक दर्शन की संकीर्ण परिभाषा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का समन्वित रूप है। वह विश्लेषण भी देती है, साधना भी; प्रेम भी देती है, विवेक भी; त्याग भी सिखाती है, सहभागिता भी। इसलिए वह आज भी प्रासंगिक है—क्योंकि मनुष्य आज भी कर्म और अर्थ, स्वतंत्रता और जिम्मेदारी, अहंकार और करुणा के बीच झूल रहा है। गीता उस झूले को स्थिर नहीं करती; वह उसमें संतुलन सिखाती है। यही उसका शाश्वत दर्शन है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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