सेल्फ-लव नहीं, सेल्फ-जागरूकता ही सच्चा प्रेम है

आज “सेल्फ-लव” शब्द फैशन बन गया है। हर ओर संदेश है—खुद से प्यार करो, खुद को खुश रखो, खुद को प्राथमिकता दो। पर प्रश्न यह है कि क्या स्वयं से प्रेम केवल अच्छा महसूस करने का नाम है? क्या हर इच्छा को पूरा करना, हर सुविधा को स्वीकार कर लेना और हर आलोचना से बच जाना ही आत्म-प्रेम है?

सच तो यह है कि सच्चा आत्म-प्रेम सुखद नहीं, साहसी होता है। वह हमें आईने के सामने खड़ा कर देता है—बिना सजावट, बिना बहाने, बिना दिखावे के। वह पूछता है—क्या तुम वास्तव में वही हो, जो होने का दावा करते हो? क्या तुम्हारे निर्णय तुम्हारे मूल्यों के अनुरूप हैं? क्या तुम अपने डर से भाग रहे हो या उनका सामना कर रहे हो?

खुद से प्रेम का अर्थ है—अपने प्रति निर्मम सत्यनिष्ठ होना। “निर्मम” इसलिए, क्योंकि इसमें बहाने नहीं चलते। यदि हम आलस्य में डूबे हैं, तो उसे “आराम” कहकर ढँकना आत्म-प्रेम नहीं है। यदि हम अनुशासन से बच रहे हैं, तो उसे “स्वतंत्रता” कहना आत्म-धोखा है। यदि हम अपनी कमजोरी को स्वीकार नहीं कर पा रहे, तो हम स्वयं से ईमानदार नहीं हैं।

आत्म-जागरूकता ही आत्म-प्रेम है। जब हम अपनी प्रवृत्तियों, अपनी सीमाओं, अपने स्वभाव और अपने उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से पहचान लेते हैं, तभी हम अपने विकास की दिशा तय कर सकते हैं। जागरूकता हमें यह देखने की क्षमता देती है कि कहाँ हम सही हैं और कहाँ सुधार की आवश्यकता है। यह दर्दनाक भी हो सकता है, क्योंकि सच्चाई अक्सर असुविधाजनक होती है। पर वही असुविधा हमें मजबूत बनाती है।

इसके विपरीत, आत्म-भोग (self-indulgence) एक मीठा भ्रम है। वह कहता है—जो मन करे करो, खुद को मत रोको, तुम्हारी हर इच्छा जायज़ है। धीरे-धीरे यह सोच हमें अनुशासनहीन बना देती है। हम हर कमजोरी को “स्वीकृति” का नाम देने लगते हैं। पर वास्तविक स्वीकृति का अर्थ अपनी कमियों को पोषित करना नहीं, उन्हें समझकर रूपांतरित करना है।

सच्चा आत्म-प्रेम हमें ऊँचा उठाता है, आसान रास्ता नहीं दिखाता। वह हमें बेहतर बनने की चुनौती देता है। वह कहता है—तुम्हारे भीतर क्षमता है, इसलिए तुम स्वयं को और अधिक जिम्मेदार बनाओ। वह हमें तत्काल सुख के बजाय दीर्घकालिक संतोष की ओर ले जाता है।

जब हम स्वयं के प्रति सच्चे हो जाते हैं, तब बाहरी स्वीकृति की आवश्यकता कम हो जाती है। क्योंकि हमें पता होता है कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं। आत्म-जागरूक व्यक्ति आलोचना से टूटता नहीं, वह उसे परखता है। प्रशंसा से बहकता नहीं, वह उसे संतुलन से स्वीकार करता है।

अंततः, स्वयं से प्रेम का अर्थ स्वयं को लाड़-प्यार देना नहीं, बल्कि स्वयं को गढ़ना है। यह अपने भीतर के आलस्य, भय और भ्रम से ईमानदारी से सामना करने का साहस है। यह स्वीकार करना है कि हम अपूर्ण हैं, पर सुधार के लिए प्रतिबद्ध हैं।

जब आत्म-जागरूकता हमारी आदत बन जाती है, तब आत्म-प्रेम स्वतः प्रकट होता है। और तब हम समझते हैं—खुद से प्यार करना आसान महसूस करना नहीं, बल्कि कठिन सत्य को अपनाना है। वही सत्य हमें स्वतंत्र, मजबूत और वास्तविक बनाता है।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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