फ़िल्म “Accused”: आरोपों, महत्वाकांक्षा और अधूरी कहानी का सिनेमाई मुक़दमा
कल रात नेटफ्लिक्स की भीड़भाड़ वाली डिजिटल गलियों में टहलते-टहलते मेरी नज़र एक फिल्म पर जा अटकी—“Accused”। नाम सुनते ही लगा जैसे कोई कोर्टरूम ड्रामा होगा, जिसमें सच और झूठ के बीच रस्साकशी चलेगी, आरोपों के जाल में फँसे किरदार अपनी निर्दोषता साबित करने की जद्दोजहद करेंगे और दर्शक अंत तक साँस रोके बैठा रहेगा।
पर फिल्म देखने के बाद जो अनुभव हुआ, वह कुछ मिला-जुला ही रहा। पूरी तरह “पैसे वसूल” तो नहीं कहा जा सकता। वैसे भी यह फिल्म ओटीटी पर देखी, इसलिए मल्टीप्लेक्स में 700 रुपये के टिकट और 400 रुपये के पॉपकॉर्न के साथ देखने लायक वैल्यू शायद नहीं होती। लेकिन ओटीटी पर इसे बिना किसी विशेष पछतावे के देखा जा सकता है।
फिल्म की कहानी एक सर्जन डॉ. गीतिका के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो ब्रिटेन में अपने करियर की ऊँचाइयों की ओर तेज़ी से बढ़ रही है। अस्पताल में उसका नाम है, प्रतिष्ठा है, प्रमोशन की संभावना है, और निजी जीवन में उसकी पत्नी मीरा के साथ एक स्थिर जीवन चल रहा है। दोनों मिलकर एक बच्चे को गोद लेने की तैयारी कर रहे हैं।
जीवन की गाड़ी पटरी पर ठीक-ठाक दौड़ रही होती है—और तभी अचानक उस पर आरोपों की ब्रेक लग जाती है।
अस्पताल में शिकायतें आने लगती हैं—गीतिका पर कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आरोप।
एक-एक करके कई आरोप सामने आते हैं।
और देखते-ही-देखते एक सफल डॉक्टर का करियर, उसकी प्रतिष्ठा और उसका निजी जीवन—सब कुछ सवालों के घेरे में आ जाता है।
कहानी का बीज यहाँ तक काफी रोचक लगता है।
ऐसा विषय जिसमें सत्ता, प्रतिष्ठा, लैंगिक राजनीति, कार्यस्थल की नैतिकता और सोशल मीडिया की अदालत—सब एक साथ आ सकते थे।
पर समस्या यह है कि फिल्म इन विषयों को छूती तो है, मगर उन्हें पूरी तरह पकड़ नहीं पाती।
फिल्म का निर्देशन अनुभूति कश्यप ने किया है। यह उनका दूसरा फीचर फिल्म प्रोजेक्ट है। उनसे उम्मीद थी कि वे इस संवेदनशील और जटिल विषय को गहराई के साथ पेश करेंगी। लेकिन कई जगह ऐसा महसूस होता है कि फिल्म कहानी कहने से ज़्यादा विचारों को थोपने में व्यस्त है।
आज के समय में जब सिनेमा अक्सर “सही बात” कहने की जल्दी में रहता है, तो कई बार कहानी पीछे छूट जाती है।
“Accused” भी कुछ वैसी ही फिल्म साबित होती है—विचार हैं, किरदार हैं, उनमें संभावनाएँ भी हैं, लेकिन उन संभावनाओं को पूरी तरह भुनाया नहीं गया।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इस फिल्म में कोंकणा सेन शर्मा जैसी अभिनेत्री हैं, जिनका नाम आते ही अभिनय की एक खास गहराई की उम्मीद अपने-आप पैदा हो जाती है। लेकिन इस बार उनका किरदार जैसे आधा-अधूरा लिखा गया है।
गीतिका का चरित्र लगभग एक ही परत में सिमट कर रह जाता है—
“महत्त्वाकांक्षी समलैंगिक महिला डॉक्टर।”
उसके भीतर के द्वंद्व, डर, अपराधबोध या आत्मरक्षा—इनमें से किसी को भी विस्तार से देखने का अवसर फिल्म नहीं देती। अभिनय अच्छा होने के बावजूद किरदार में वह मांस-मज्जा नहीं है जो उसे जीवंत बना सके। और जब किरदार अधूरा हो तो कलाकार कितना ही सक्षम क्यों न हो, वह उसे पूरी ऊँचाई तक नहीं पहुँचा सकता।
दूसरी ओर प्रतिभा रांटा का किरदार मीरा—जो मेरठ से आई एक डॉक्टर है—और भी कम विकसित दिखाई देता है। उसका जीवन कई स्तरों पर जटिल होना चाहिए था। वह अपने परिवार से अपनी पहचान छुपाए हुए है, वह एक समलैंगिक विवाह में है, और ऊपर से यह भी बताया जाता है कि वह जल्द ही माँ बनने वाली है।
इन परिस्थितियों में भावनाओं का तूफान होना चाहिए था।
लेकिन फिल्म में यह सब लगभग सपाट संवादों में गुजर जाता है—जैसे किसी ने जीवन की सबसे बड़ी घटनाओं को भी ऑफिस की मीटिंग नोट्स की तरह दर्ज कर दिया हो।
कई दृश्यों में दोनों के बीच वह सहजता भी नहीं दिखती जो दो जीवनसाथियों के बीच होती है।
न निजी भाषा, न अंतरंगता की गर्माहट।
कभी-कभी लगता है जैसे वे पति-पत्नी नहीं बल्कि दो डॉक्टर हैं जो किसी मेडिकल कॉन्फ़्रेंस के कॉरिडोर में शिष्टाचार निभा रहे हों।
फिल्म में रोमांच पैदा करने के लिए कई किरदार भी जोड़े गए हैं—एक ईर्ष्यालु पूर्व सहकर्मी, एक पुरानी प्रेमिका और एक निजी जासूस।
पर ये किरदार कहानी में ऐसे प्रवेश करते हैं जैसे किसी नाटक में अचानक बिना संवाद के कलाकार मंच पर आकर खड़े हो जाएँ। उनकी उपस्थिति कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे और उलझा देती है।
फिल्म का बैकग्राउंड म्यूज़िक भी कई बार अनावश्यक रूप से जोरदार हो जाता है—जैसे निर्देशक को डर हो कि कहीं दर्शक यह भूल न जाए कि अभी “सस्पेंस” चल रहा है।
असल समस्या यह है कि फिल्म अपने विषय को लेकर इतनी चिंतित दिखाई देती है कि वह कहानी कहना भूल जाती है। वह यह बताना चाहती है कि समाज में शक्ति कैसे भ्रष्ट हो सकती है, सोशल मीडिया कैसे फैसले सुनाता है और लैंगिक राजनीति किस तरह काम करती है।
लेकिन ये सारी बातें अंत में लगभग उपदेश की तरह सामने आती हैं—जैसे किसी किरदार को मंच पर खड़ा करके उससे निबंध पढ़वा दिया गया हो। जबकि सिनेमा की खूबसूरती यही है कि वह बातें सीधे नहीं कहता, बल्कि उन्हें जीने देता है।
फिर भी फिल्म पूरी तरह निरर्थक नहीं है।
इसके भीतर एक दिलचस्प विचार छिपा है—यह कि आरोप और सच के बीच की दूरी कितनी जटिल हो सकती है। कभी-कभी सच अदालत में नहीं, बल्कि लोगों की धारणाओं में तय हो जाता है।
आज के डिजिटल युग में, जहाँ सोशल मीडिया एक समानांतर न्यायालय बन चुका है, यह विषय बेहद प्रासंगिक है। लेकिन अफसोस यह है कि फिल्म उस जटिलता को गहराई से खोजने के बजाय सतह पर ही रुक जाती है।
कुल मिलाकर “Accused” ऐसी फिल्म है जो बहुत कुछ कहना चाहती है, मगर उतना कह नहीं पाती। उसके पास विषय है, कलाकार हैं और संभावनाएँ भी हैं—पर कहानी का वह भावनात्मक रक्तसंचार नहीं है जो एक अच्छे सिनेमा को सचमुच जीवित रखता है।
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