जब स्क्रीन माँ-बाप बन जाए — डिजिटल पालन-पोषण के युग में बचपन का भविष्य
आज के भारतीय परिवार की एक सामान्य शाम की कल्पना करें: माँ रसोई में है और बच्चा
‘एलेक्सा’ से पूछ रहा है कि होमवर्क में क्या करना है। पिता वीडियो कॉल पर व्यस्त हैं। दादी
‘यूट्यूब’ पर भजन सुन रही हैं। और पाँच साल का बेटा एआई-एल्गोरिदम-अनुशंसित वीडियो
देख रहा है। यह दृश्य अब असाधारण नहीं — यह भारत के लाखों मध्यवर्गीय घरों की दैनिक
वास्तविकता है। कृत्रिम मेधा और डिजिटल तकनीक ने पारिवारिक जीवन को उसकी जड़ों से
हिला दिया है। माँ-बाप और बच्चे के बीच जो संवाद, खेल, कहानियाँ और स्पर्श पहले
पारिवारिक विकास का मूल स्रोत थे — वे अब तेज़ी से एआई-मध्यस्थ हो रहे हैं। यह एक
ऐसा परिवर्तन है जिसका दीर्घकालिक प्रभाव अभी पूरी तरह समझ में नहीं आया है, लेकिन
प्रारंभिक शोध चिंताजनक संकेत दे रहे हैं — और यह संकेत केवल पश्चिमी देशों की चिंता
नहीं, बल्कि भारतीय परिवार के अस्तित्व का प्रश्न बन रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2024 के दिशानिर्देशों के अनुसार दो वर्ष से कम आयु के बच्चों
को किसी भी प्रकार की स्क्रीन-टाइम से बचाना चाहिए, और दो से पाँच वर्ष के बच्चों के
लिए दैनिक एक घंटे से अधिक उचित नहीं है। परंतु वास्तविकता बिल्कुल भिन्न है: एक
अमेरिकी अध्ययन के अनुसार शून्य से दो वर्ष के अमेरिकी बच्चे औसतन तीन घंटे प्रतिदिन
स्क्रीन के सामने बिताते हैं। भारत में यूनिसेफ की 2023 रिपोर्ट बताती है कि भारतीय बच्चे
प्रतिदिन औसतन चार से छह घंटे डिजिटल उपकरणों पर बिताते हैं — यह वैश्विक औसत से
काफी अधिक है। कोविड-19 महामारी के बाद से यह संख्या और बढ़ी है, और जो डिजिटल
आदतें उस आपात काल में बनीं, वे अब स्थायी हो चुकी हैं।
“बचपन वह समय है जब मनुष्य सबसे अधिक सीखता है — और वह
सीखना माँ की कहानी में, पिता के स्पर्श में, और दोस्त के साथ खेल में
होता है, किसी एल्गोरिदम में नहीं।” — मारिया मोंटेसरी के सिद्धांतों से प्रेरित
भारत में एआई और बाल-विकास का प्रश्न विशेष रूप से जटिल है, क्योंकि यहाँ शहरी
और ग्रामीण वास्तविकताएँ बिल्कुल भिन्न हैं। दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु जैसे महानगरों में ‘स्मार्ट
पेरेंटिंग’ के नाम पर बच्चों के सामने एआई-शैक्षिक उपकरणों की बाढ़ आ गई है। एक ओर
ये बच्चे वैश्विक ज्ञान तक पहुँच बना रहे हैं, दूसरी ओर उनके सामाजिक कौशल, भावनात्मक
बुद्धिमत्ता और रचनात्मकता पर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। ग्रामीण भारत में स्थिति और
चिंताजनक है, जहाँ प्रथम पीढ़ी के स्मार्टफोन उपयोगकर्ता अपने बच्चों को ‘यूट्यूब’ पर छोड़
देते हैं ताकि वे ‘स्मार्ट’ बनें, लेकिन ‘डिजिटल पेरन्टींग’ की कोई समझ या प्रशिक्षण न होने के
कारण बच्चे अनुपयुक्त, हिंसक या व्यावसायिक कंटेंट के शिकार हो रहे हैं। नासकॉम की
2024 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में दस से चौदह वर्ष के बासठ प्रतिशत बच्चे बिना माता-
पिता की निगरानी के इंटरनेट का उपयोग करते हैं।
तंत्रिका विज्ञान के क्षेत्र में नवीनतम शोध चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। नैशनल
इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ के 2023 अध्ययन ‘एबीसीडी स्टडी’ में पाया गया कि जो बच्चे दो या
अधिक घंटे प्रतिदिन स्क्रीन के सामने बिताते हैं, उनके मस्तिष्क की बाह्य परत पतली होती
है — जो ध्यान, स्मृति और भाषा के लिए ज़िम्मेदार है। दूसरी ओर, कुछ शोध यह भी दर्शाते
हैं कि गुणवत्तापूर्ण, इनरैक्टिव एआई-शैक्षिक कंटेंट बच्चों की समस्या-समाधान क्षमता और
तार्किक सोच को बढ़ा सकता है। एमआईटी मीडिया लैब के शोधकर्ताओं ने पाया है कि जब
माता-पिता बच्चों के साथ बैठकर डिजिटल अनुभव साझा करते हैं, तो उसके नकारात्मक
प्रभाव काफी कम हो जाते हैं। इसलिए प्रश्न केवल ‘कितना समय’ का नहीं, बल्कि ‘कैसा
कंटेंट’ और ‘किस संदर्भ में’ का है — एक ऐसा सूक्ष्म अंतर जिसे अधिकांश पेरेंटिंग बहसें
अनदेखी कर देती हैं।
“बच्चे का मस्तिष्क एक बगीचे की तरह है — उसे मानवीय उपस्थिति, प्रेम
और संघर्ष की धूप-छाँव चाहिए। एआई उसे ग्रीनहाउस में उगा सकता है,
लेकिन खुले आकाश में नहीं।” — डॉ. शेरी तर्किल, एमआईटी
एआई और बाल-विकास के संदर्भ में सबसे कम चर्चित, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न
भावनात्मक विकास का है। बच्चे भावनाएँ सीखते हैं — दूसरे मनुष्यों को देखकर, उनसे बात
करके, उनके साथ खेलकर। एक माँ की थकान में भी उसके चेहरे पर जो भाव होते हैं, वे
बच्चे को ‘सहानुभूति’ सिखाते हैं; एक पिता की डाँट में भी जो प्रेम छिपा होता है, वह बच्चे
को ‘सीमाएँ’ सिखाता है। एआई-चैटबॉट, चाहे कितने भी परिष्कृत हों, वे इस ‘मानवीय अनुभव
की सूक्ष्मता’ को प्रदान नहीं कर सकते। अमेरिका साइकलाजिकल एसोसिएशन की 2024 रिपोर्ट
बताती है कि ‘एआई कम्पैन्यन ऐप्स’ का उपयोग किशोरों में बढ़ रहा है, और इससे वास्तविक
मानवीय संबंधों की क्षमता में कमी आ रही है। किंतु इस तस्वीर का एक उजला पहलू भी है
— विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए एआई-संचालित थेरेपी ऐप्स ने संवाद और
सामाजिक कौशल में उल्लेखनीय सुधार दिखाए हैं, और भारत के दूरदराज़ के क्षेत्रों में एआई-
शिक्षण उपकरण पहली पीढ़ी के शिक्षार्थियों को वैश्विक ज्ञान का द्वार खोल रहे हैं।
इस स्थिति में व्यावहारिक नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक है। भारत सरकार को एक
व्यापक ‘डिजिटल पेरन्टींग फ्रेमवर्क’ विकसित करनी चाहिए। बचपन से ही बच्चों को एआई की प्रकृति
और उसके बुद्धिमान उपयोग के बारे में शिक्षित किया जाए। सभी बाल-उपयोगी एआई
उत्पादों के लिए अनिवार्य सुरक्षा प्रमाणन लागू हो। परिवारों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे
भोजन और सोने के समय ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का पालन करें। आईसीएमआर और एनसीईआरटी
को मिलकर भारतीय बच्चों पर एआई के दीर्घकालिक प्रभावों का अध्ययन करना चाहिए,
ताकि नीतियाँ अनुमान पर नहीं, साक्ष्य पर आधारित हों।
बचपन मानव-जीवन का सबसे कोमल और महत्वपूर्ण चरण है — और इस चरण में
जो नींव रखी जाती है, वह जीवनभर के व्यक्तित्व को आकार देती है। हमें एआई को न तो
पूरी तरह अस्वीकार करना है और न ही आँखें बंद करके अपना लेना है। हमें वह ‘डिजिटल
विवेक’ विकसित करना है जो यह जानता हो कि कब बच्चे को एल्गोरिदम की नहीं, माँ की
गोद की ज़रूरत है; कब ऑनलाइन वीडियो की नहीं, पिता की कहानी की; कब स्मार्टफोन की
नहीं, दोस्त के साथ खेल की। तकनीक हमारी सेवा के लिए है — हम तकनीक की सेवा के
लिए नहीं। और बच्चों के मामले में यह सत्य और भी अधिक अनिवार्य है, क्योंकि बचपन
दोबारा नहीं आता, और बचपन में की गई भूलें जीवनभर पीछा करती हैं।
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