वोट क्यों कटे?
सिर्फ इसलिए कि आदमी मर गया?
जो चुनाव हार रहे हैं, उनकी बात आजकल कोई सुन ही नहीं रहा। वे बेचारे चीख-चीखकर कह रहे हैं कि जब से सत्ताधीन सरकार ने यह नया सरफिरा SIR नियम लागू किया है, तब से हमारे सारे भरोसेमंद वोटर सूची से ऐसे गायब हो गए हैं, जैसे नेता चुनाव जीतने के बाद अपने वादे से गायब हो जाता है।
वे कहते हैं—
“भाई साहब, ऐसे कैसे चुनाव जीतेंगे? हमारे वोट कट रहे हैं। जिन पर हमें सबसे ज्यादा भरोसा था, वही वोटर लिस्ट से बाहर कर दिए गए।”
मैंने एक हारे हुए प्रत्याशी से पूछ ही लिया—
“आपके भरोसेमंद वोटर आखिर कौन से थे?”
वे गंभीर होकर बोले—
“मृत आत्माएँ!”
मैंने कहा—“मृत आत्माएँ?”
वे बोले—
“हाँ, वही तो सबसे भरोसेमंद वोटर थे। जिंदा आदमी तो आखिरी वक्त पर बिक भी सकता है, बहक भी सकता है, नाराज भी हो सकता है, लेकिन मृत आत्मा स्थिर विचारधारा की होती है। मरा हुआ वोटर आदर्श वोटर होता है। वह न सड़क मांगता है, न नाली। न अस्पताल मांगता है, न स्कूल। न बिजली बिल पर छूट चाहिए, न गैस सिलेंडर पर सब्सिडी। न वह नेता से नाराज़ होता है, न सवाल पूछता है। वह शांत, निर्विकार, निष्काम कर्मयोगी मतदाता है। वह बस अपना नाम छोड़कर जाता है—‘लो बेटा, मेरा वोट राष्ट्रहित में उपयोग कर लेना।’
मरने के बाद आदमी का चरित्र मजबूत टाइप का हो जाता है। उसे लोक बदलना मंजूर होता है, लेकिन पार्टी बदलना मंजूर नहीं होता।”
यह भी कोई बात हुई जनाब! आदमी मर गया तो क्या इतना मर गया कि वोट भी न डाल सके? मृत्यु कोई इतनी बड़ी प्रशासनिक घटना नहीं है कि आदमी के साथ उसका मतदान-अधिकार भी श्मशान घाट में जला दिया जाए।
देखिए, आत्माएँ वोट देने आती हैं—ताकि लोकतंत्र की आत्मा ज़िंदा रहे। असली समस्या तो यह है कि नेताओं की आत्माएँ मर चुकी हैं। वे जीवित होकर भी वोट डालने लायक नहीं हैं, और मतदाता की आत्मा मरने के बाद भी जीवित है। फिर चुनाव आयोग को आपत्ति किस बात की है?
अब सरकार को इसमें भी समस्या हो गई। कह रही है कि मृत आदमी वोट नहीं दे सकता। अब ये आत्माएँ कोई नरक से बूथ तक आने का यात्रा-भत्ता मांग रही हैं? कौन-सा भूत ईवीएम पर कब्जा करके बैठा है? कौन-सी आत्मा ने डी.ए., टी.ए., होटल बिल या स्वर्ग-नरक कनेक्टिंग फ्लाइट का क्लेम लगाया है? बेचारा चुपचाप आता है, वोट डालता है और वापस चला जाता है। न मंच मांगता है, न माला, न माइक। न सेल्फी, न स्वागत-द्वार। इतना सस्ता, शांत और संस्कारी वोटर आपको जीवितों में कहाँ मिलेगा?
लेकिन मैंने दूसरा सवाल दागा—
“सुना है वोटर लिस्ट में उम्र का भी बड़ा भारी घोटाला बताया जा रहा है। कहीं 65 साल का बाप है और 63 साल का बेटा। कहीं 60 साल की माँ है और 58 साल का बेटा। लोग पूछ रहे हैं—यह कैसे संभव है?”
अरे भई, आप पुनर्जन्म में विश्वास नहीं रखते क्या? हो सकता है बेटा पिछले जन्म में बाप रहा हो और बाप इस जन्म में बेटा बनने की लाइन में थोड़ा लेट हो गया हो। लोकतंत्र में सब संभव है।
हो सकता है आत्मा हर पाँच साल में वोट देने के लिए अपने हिसाब से नया बाप और नई माँ चुनती हो। इस बार सोच लिया हो—“चलो, इस चुनाव में शर्मा जी के यहाँ बेटा बन जाते हैं। पिछली बार गुप्ता जी के यहाँ दादा थे, इस बार थोड़ा युवा प्रोफाइल रखेंगे।”
लेकिन लोग लॉजिक समझते ही नहीं। सरकार जब इलॉजिकल काम करती है तो उसे नीति कहती है, और विपक्ष जब इलॉजिकल बात करता है तो उसे लोकतंत्र की हत्या कहता है।
चुनाव आयोग कह रहा है—
“भूत वोट नहीं डाल सकते।”
प्रत्याशी कह रहे हैं—
“भूत नहीं डालेंगे तो फिर हमारा भविष्य कौन बचाएगा?”
अब जब ऐसे संस्कारी वोटरों को भी हटाया जाएगा, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होगी ही।
मैं तो कहता हूँ, जो ज़िंदा लोग वोट डाल रहे हैं, पहले उनकी जीवितता की जाँच होनी चाहिए। एक बोतल, कुछ नोट, जाति का जोश और मोहल्ले के ठेकेदार की आँख देखकर वोट देने वाला आदमी लोकतांत्रिक रूप से कितना जीवित है—यह कौन बताएगा? शरीर में धड़कन है, मगर विवेक वेंटिलेटर पर है। पैर बूथ तक जा रहे हैं, मगर आत्मा पहले ही पार्टी कार्यालय में गिरवी रखी जा चुकी है।
हम सनातन परंपरा के आदमी हैं मित्र! हम पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।
बब्बन चाचा को ही देख लीजिए। उनकी स्वर्गवासी चाची वैसे तो कभी सपने में भी नजर नहीं आतीं, लेकिन चुनाव आते ही वे बूथ पर वोट डालने जरूर आती हैं। भारत के लोकतंत्र में चाची का इतना अटूट विश्वास है कि स्वर्ग में रहकर भी उन्हें बूथ का रास्ता याद रहता है।
बब्बन चाचा नहा-धोकर, गमछा डालकर बूथ पर पहुँच जाते हैं। अधिकारी पूछता है—
“चाची तो स्वर्गवासी हो गईं?”
बब्बन चाचा गंभीर होकर कहते हैं—
“हाँ बेटा, लेकिन मैं इस आस में आ जाता हूँ कि वोट डालने तो वे हर बार जरूर आती हैं। क्या पता, कभी यहीं मुलाकात हो जाए।”
यही तो हमारी सभ्यता की विशेषता है। एक आम वोटर अपनी वसीयत में जायदाद-संपत्ति छोड़े या न छोड़े, लेकिन चाहे तो अपना नाम वोटर लिस्ट में अमित छाप की तरह छोड़ सकता है। यह कोई फर्जीवाड़ा नहीं, यह लोक और परलोक का संयुक्त लोकतांत्रिक उपक्रम है।
और फिर यह कहना कि मृतक वोट नहीं डाल सकता, भयंकर भौतिकवादी सोच है। आत्मा अजर-अमर है। गीता में साफ कहा गया है—
“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः।”
जब आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती, तो चुनाव आयोग उसका वोट कैसे काट सकता है?
असल बात यह है कि वोट की चोरी हो रही है जनाब! मृतक अपना नाम वोटर लिस्ट में छोड़कर गया था। जैसे आदमी खेत छोड़ जाता है, मकान छोड़ जाता है, पुरानी अलमारी में पॉलिसी के कागज़ छोड़ जाता है, वैसे ही अनुभवी आदमी वोट छोड़ जाता है। यह उसकी लोकतांत्रिक विरासत है।
हमारे यहाँ आदमी मर सकता है, पर वोट नहीं मरता।
वोट अमर है।
वोटर नश्वर है।
और नेता?
नेता का क्या है—वे तो जन्म-जन्मांतर से वही कर रहे हैं। बस पार्टी बदलकर पुनर्जन्म ले रहे हैं।
अब बेचारे हारे हुए प्रत्याशी परेशान हैं। कह रहे हैं—
“हमारे तो जिंदा वोटर वैसे ही अविश्वसनीय निकले, ऊपर से मृत वोटर भी काट दिए। अब चुनाव लड़ें या श्राद्ध कराएँ?”
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