होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट

होरमुज जलडमरूमध्य के बंद होने से उत्पन्न वैश्विक ऊर्जा संकट
होरमुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति तंत्र का वह संकीर्ण लेकिन अत्यंत संवेदनशील मार्ग है, जिस पर
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिरता काफी हद तक निर्भर करती है। यह जलमार्ग फारस की खाड़ी
को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है, और इसके माध्यम से पश्चिम एशिया के प्रमुख
तेल उत्पादक देश—जैसे सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और ईरान—अपना कच्चा तेल
और गैस अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचाते हैं। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार विश्व में समुद्री
मार्ग से होने वाले कुल पेट्रोलियम व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है,
जो इसे ऊर्जा आपूर्ति की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ बनाता है। इस संदर्भ में यदि होरमुज
जलडमरूमध्य किसी कारणवश बंद हो जाए या उसकी आवाजाही बाधित हो जाए, तो इसका प्रभाव केवल
क्षेत्रीय नहीं, बल्कि तत्काल वैश्विक स्तर पर दिखाई देता है।
इस संभावित संकट की गंभीरता को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार किस
प्रकार परस्पर जुड़ा हुआ है। तेल और गैस की आपूर्ति में थोड़ी सी भी बाधा कीमतों में तीव्र उतार-चढ़ाव पैदा
कर सकती है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि 1973 का तेल संकट, ईरान-इराक युद्ध या 2019 में सऊदी
अरब के अबकैक तेल संयंत्र पर हुए हमले जैसे घटनाक्रमों ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता पैदा की थी।
होरमुज जलडमरूमध्य का बंद होना इन घटनाओं से कहीं अधिक व्यापक प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि
यहाँ से प्रतिदिन लगभग 17 से 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है। यदि यह आपूर्ति अचानक रुक
जाए, तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता में भारी कमी आ सकती है, जिससे कीमतों में अप्रत्याशित
वृद्धि होना लगभग निश्चित है।
ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल पेट्रोल या डीजल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह संपूर्ण आर्थिक
प्रणाली को प्रभावित करता है। तेल आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ है—परिवहन, उद्योग, कृषि, और यहाँ
तक कि खाद्य आपूर्ति भी इससे प्रभावित होती है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो उत्पादन लागत बढ़
जाती है, जिससे वस्तुओं और सेवाओं के दाम बढ़ते हैं और महंगाई का दबाव उत्पन्न होता है। अंतरराष्ट्रीय
मुद्रा कोष और विश्व बैंक के विभिन्न विश्लेषणों में यह स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा कीमतों में तीव्र वृद्धि
वैश्विक आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है। विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए, जो ऊर्जा आयात
पर निर्भर हैं, यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि उनके व्यापार संतुलन और मुद्रा पर सीधा प्रभाव
पड़ता है।

भारत जैसे देश, जो अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, इस
प्रकार के संकट से विशेष रूप से प्रभावित होते हैं। भारत के तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया
से आता है, और यह आपूर्ति काफी हद तक होरमुज जलडमरूमध्य पर निर्भर है। यदि इस मार्ग में बाधा
आती है, तो न केवल आपूर्ति प्रभावित होगी, बल्कि वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदने की लागत भी बढ़
जाएगी। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, जिसमें चालू खाते का घाटा बढ़ सकता है,
मुद्रा पर दबाव आ सकता है और घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। यह स्थिति सरकार
की वित्तीय नीतियों और सब्सिडी व्यवस्था पर भी अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
इस संभावित संकट का एक महत्वपूर्ण आयाम भू-राजनीतिक भी है। होरमुज जलडमरूमध्य लंबे समय से
अंतरराष्ट्रीय तनाव का केंद्र रहा है, विशेष रूप से ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संबंधों के संदर्भ में। समय-
समय पर इस क्षेत्र में सैन्य गतिविधियाँ और जहाजों पर हमलों की घटनाएँ सामने आती रही हैं, जो इस
जलमार्ग की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाती हैं। यदि किसी बड़े सैन्य संघर्ष या राजनीतिक टकराव के कारण
यह मार्ग बंद होता है, तो यह केवल ऊर्जा संकट ही नहीं, बल्कि वैश्विक सुरक्षा संकट का रूप भी ले सकता है।
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बार-
बार बल दिया है, क्योंकि इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ता है।
हालाँकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ देशों ने इस निर्भरता को कम करने के
प्रयास किए हैं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने वैकल्पिक पाइपलाइन मार्ग विकसित किए हैं,
जिनके माध्यम से वे अपने तेल को सीधे लाल सागर या ओमान की खाड़ी तक पहुँचा सकते हैं। इसके
अलावा, अमेरिका और अन्य देशों में शेल ऑयल उत्पादन में वृद्धि ने भी वैश्विक आपूर्ति को कुछ हद तक
विविधतापूर्ण बनाया है। लेकिन इन सभी उपायों के बावजूद, होरमुज जलडमरूमध्य का महत्व अभी भी
अत्यंत अधिक है, और इसकी पूर्ण बंदी की स्थिति में ये वैकल्पिक मार्ग पूरी कमी को पूरा करने में सक्षम
नहीं हैं।


इस संकट के संदर्भ में वैश्विक ऊर्जा संक्रमण (एनर्जी ट्रांजिशन) की आवश्यकता भी और अधिक स्पष्ट हो
जाती है। यदि दुनिया धीरे-धीरे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों—जैसे सौर, पवन और जलविद्युत—की ओर बढ़ती
है, तो इस प्रकार के भू-राजनीतिक जोखिमों का प्रभाव कम किया जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने
अपने विभिन्न परिदृश्यों में यह संकेत दिया है कि ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और स्वदेशी उत्पादन
बढ़ाना भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए आवश्यक है। भारत ने भी अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और अपनी

नवीकरणीय ऊर्जा नीतियों के माध्यम से इस दिशा में कदम बढ़ाए हैं, लेकिन यह संक्रमण अभी प्रारंभिक
अवस्था में है और निकट भविष्य में तेल पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं होने वाली है।
इस परिस्थिति में नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे अल्पकालिक संकट प्रबंधन
और दीर्घकालिक रणनीति के बीच संतुलन स्थापित करें। अल्पकालिक स्तर पर रणनीतिक पेट्रोलियम
भंडार (स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व) का निर्माण और उसका प्रभावी उपयोग महत्वपूर्ण है। भारत ने
विशाखापत्तनम, मंगलुरु और पादुर में अपने रणनीतिक भंडार विकसित किए हैं, जो आपातकालीन स्थिति
में कुछ समय तक आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं। इसके अलावा, ऊर्जा आयात के स्रोतों का
विविधीकरण—जैसे अमेरिका, अफ्रीका और रूस से तेल खरीद—भी जोखिम को कम करने में सहायक हो
सकता है।
अंततः, होरमुज जलडमरूमध्य का संभावित बंद होना केवल एक भौगोलिक या क्षेत्रीय घटना नहीं, बल्कि
वैश्विक अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित कमजोरियों को उजागर करने वाला परिदृश्य है। यह हमें यह सोचने के
लिए मजबूर करता है कि क्या हमारी ऊर्जा व्यवस्था अत्यधिक केंद्रीकृत और जोखिमपूर्ण है, और क्या हमें
अधिक टिकाऊ, विकेंद्रीकृत और सुरक्षित विकल्पों की ओर तेजी से बढ़ना चाहिए। जब तक दुनिया तेल और
गैस पर इतनी अधिक निर्भर रहेगी, तब तक होरमुज जैसे चोक पॉइंट वैश्विक अस्थिरता के केंद्र बने रहेंगे।
इसलिए, यह केवल संकट की आशंका नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—एक ऐसी चेतावनी, जिसे नजरअंदाज
करना भविष्य के लिए अत्यंत महंगा साबित हो सकता है।

Dr Shailesh Shukla

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन…

राजभाषा अधिकारी, एनएमडीसी लिमिटेड [भारत सरकार का उद्यम] हीरा खनन परियोजना, मझगवाँ, पन्ना (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए.(हिंदी), एम.ए.(जनसंचार), पीएचडी प्रकाशन : भारत सहित विश्व के अनेक देशों से प्रकाशित विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं - अस्मिता, राजभाषा भारती,

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